Sunday, December 12, 2010

Monday, November 15, 2010

Thursday, October 28, 2010

संजय दिर्वेदी ,इन्द्रिश कुमार को जाने


जिस इंद्रेश कुमार को मैं जानता हूं !!

संजय द्विवेदी
कुछ साल पहले की ही तो बात है इंद्रेश कुमार से छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में मेरी मुलाकात हुयी थी। आरएसएस के उन दिनों वे राष्ट्रीय पदाधिकारी थे। एक अखबार का स्थानीय संपादक होने के नाते मैं उनका इंटरव्यू करने पहुंचा था। अपने बेहद निष्पाप चेहरे और सुंदर व्यक्तित्व से उन्होंने मुझे प्रभावित किया। बाद में मुझे पता चला कि वे मुसलमानों को आरएसएस से जोड़ने के काम में लगे हैं। रायपुर में भी उनके तमाम चाहने वाले अल्पसंख्यक वर्ग में भी मौजूद हैं। उनसे थोड़े ही समय के बाद आरएसएस की प्रतिनिधि सभा में रायपुर में फिर मुलाकात हुयी। वे मुझे पहचान गए। उनकी स्मरण शक्ति पर थोड़ा आश्चर्य भी हुआ कि वे सालों पहले हुयी मुलाकातों और मेरे जैसे साधारण आदमी को भी याद रखते हैं। उसी इंद्रेश कुमार का नाम अजमेर बम धमाकों में पढ़कर मुझे अजीब सा लग रहा है। मुझे याद है कि इंद्रेश जी जैसे लोग ऐसा नहीं कर सकते। किंतु देश की राजनीति को ऐसा लगता है और वे शायद इसके ही शिकार बने हैं।

मेरे मन में यह सवाल आज भी कौंध रहा है कि क्या यह आदमी सचमुच बहुत खतरनाक साबित हो सकता है, क्योंकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का यह प्रचारक हिंदू-मुस्लिम एकता की बात करता है। वह मुसलमानों को राष्ट्रवाद की राह पर डालकर सदियों से उलझे रिश्तों को ठीक करने की बात कर रहा है। ऐसे आदमी को भला हिंदुस्तान की राजनीति कैसे बर्दाश्त कर सकती है। क्योंकि आज नहीं अगर दस साल बाद भी इंद्रेश कुमार अपने इरादों में सफल हो जाता है तो भारतीय राजनीति में जाति और धर्म की राजनीति करने वाले नेताओं की दुकान बंद हो जाएगी। इसलिए इस आदमी के कदम रोकना जरूरी है। यह सिर्फ संयोग नहीं है कि एक ऐसा आदमी जो सदियों से जमी बर्फ को पिघलाने की कोशिशें कर रहा है, उसे ही अजमेर के बम विस्फोट कांड का आरोपी बना दिया जाए।

अब उस इंद्रेश कुमार की भी सोचिए जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे संगठन में काम करते रहे हैं, जिसका मुख्य उद्देश्य हिंदू समाज का संगठन है। ऐसे संगठन में रहते हुए मुस्लिम समाज से संवाद बनाने की कोशिश क्या उनके अपने संगठन (आरएसएस) में भी तुरंत स्वीकार्य हो गयी होंगी। जाहिर तौर पर इंद्रेश कुमार की लड़ाई अपनों से भी रही होगी और बाहर खड़े राजनीतिक षडयंत्रकारियों से भी है। वे अपनों के बीच भी अपनी सफाई देते रहे हैं कि वे आखिर मुसलमानों को मुख्यधारा में लाने का प्रयास क्यों कर रहे हैं , जबकि संघ का मूल काम हिंदू समाज का संगठन है। इंद्रेश कुमार की कोशिशें रंग लाने लगी थीं, यही सफलता शायद उनकी शत्रु बन गयी है। क्योंकि वे एक ऐसे काम को अंजाम देने जा रहे थे जिसकी जड़ें हिंदुस्तान के इतिहास में इतनी भयावह और रक्तरंजित हैं कि सदभाव की बात करनेवालों को उसकी सजा मिलती ही है। मुसलमानों के बीच कायम भयग्रंथि और कुठांओं को निकालकर उन्हें 1947 के बंटवारे को जख्मों से अलग करना भी आसान काम नहीं है। महात्मा गांधी, पंडित नेहरू, मौलाना आजाद जैसे महानायकों की मौजूदगी के बावजूद हम देश का बंटवारा नहीं रोक पाए। उस आग में आज भी कश्मीर जैसे इलाके सुलग रहे हैं। तमाम हिंदुस्तान में हिंदू-मुस्लिम रिश्ते अविश्वास की आग में जल रहे हैं। ऐसे कठिन समय में इंद्रेश कुमार क्या इतिहास की धारा की मोड़ देना चाहते हैं और उन्हें यह तब क्यों लगना चाहिए कि यह काम इतना आसान है। यह सिर्फ संयोग ही है कि कुछ दिन पहले राहुल गांधी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को सिमी के साथ खड़ा करते हैं। एक देशभक्त संगठन और आतंकियों की जमात में उन्हें अंतर नहीं आता। नासमझ राजनीति कैसे देश को तोड़ने और भय का व्यापार करती है, ताजा मामले इसका उदाहरण हैं। इससे यह साफ संकेत जाते हैं कि इसके पीछे केंद्र और राजस्थान सरकार के इरादे क्या हैं ? देश को पता है कि इंद्रेश कुमार, आरएसएस के ऐसे नेता हैं जो मुसलमानों और हिंदू समाज के बीच संवाद के सेतु बने हैं। वे लगातार मुसलमानों के बीच काम करते हुए देश की एकता को मजबूत करने का काम कर रहे हैं। ऐसा व्यक्ति कैसे कांग्रेस की देशतोड़क राजनीति को बर्दाश्त हो सकता है। साजिश के तार यहीं हैं। क्योंकि इंद्रेश कुमार ऐसा काम कर रहे थे कि अगर उसके सही परिणाम आने शुरू हो जाते तो सेकुलर राजनीति के दिन इस देश से लद जाते। हिदू- मुस्लिम एकता का यह राष्ट्रवादी दूत इसीलिए सरकार की नजरों में एक संदिग्ध है।

राजस्थान पुलिस खुद कह रही है अभी इंद्रेश कुमार को अभियुक्त नहीं बनाया गया है। यह समय बताएगा कि छानबीन से पुलिस को क्या हासिल होता है। फिर पूरी जांच किए बिना इतनी जल्दी क्या थी।क्या बिहार के चुनाव जहां कांग्रेस मुसलमानों को एक संकेत देना चाहती थी, जिसकी शुरूआत राहुल गांधी आऱएसएस पर हमला करके पहले ही कर चुके थे। संकीर्ण राजनीतिक हितों के लिए कांग्रेस और अन्य राजनीतिक दल पुलिस का इस्तेमाल करते रहे हैं किंतु राजनीतिक दल इस स्तर पर गिरकर एक राष्ट्रवादी व्यक्तित्व पर कलंक लगाने का काम करेंगें, यह देखना भी शर्मनाक है। इससे इतना तो साफ है कि कुछ ताकतें देश में ऐसी जरूर हैं जो हिंदू-मुस्लिम एकता की दुश्मन हैं। उनकी राजनीतिक रोटियां सिंकनी बंद न हों इसलिए दो समुदायों को लड़ाते रहने में ही इनकी मुक्ति है। शायद इसीलिए इंद्रेश कुमार निशाने पर हैं क्योंकि वे जो काम कर रहे हैं वह इस देश की विभाजनकारी और वोटबैंक की राजनीति के अनूकूल नहीं हैं। अगर इस मामले से इंद्रेश कुमार बच निकलते हैं तो आखिर राजस्थान सरकार और केंद्र सरकार का क्या जवाब होगा। किंतु जिस तरह से हड़बड़ी दिखाते हुए इंद्रेश कुमार को आरोपित किया गया उससे एक गहरी साजिश की बू आती है। क्योंकि उनकी छवि मलिन करने का सीधा लाभ उन दलों को मिलना है जो मुसलमानों के वोट के सौदागर हैं। आतंकवाद के खिलाफ किसी भी कार्रवाई का देश स्वागत करता है किंतु आतंकवाद की आड़ में देशभक्त संगठनों और उनके नेताओं को फंसाने की किसी भी साजिश को देश महसूस करता है और समझता है। किसी भी राजनीतिक दल को ऐसी घटिया राजनीति से बाज आना चाहिए। किसी भी समाज के धर्मस्थल पर विस्फोट एक ऐसी घटना है जिसकी जितनी निंदा की जाए वह कम है। किंतु क्या एक डायरी में फोन नंबरों का मिल जाना एक ऐसा सबूत है जिसके आधार किसी भी सम्मानित व्यक्ति को आरोपित किया जा सकता है। हमें यह समझने की जरूरत है कि आखिर वे कौन से लोग हैं जो हिंदू-मुस्लिम समाज की दोस्ती में बाधक हैं। वे कौन से लोग हैं जिन्हें भय के व्यापार में आनंद आता है। अगर आज इंद्रेश कुमार जैसे लोगों का रास्ता रोका गया तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे संगठनों में मुस्लिम मुद्दों पर संवाद बंद हो जाएगा। हिंदुस्तान के 20 करोड़ मुसलमानों को देश की मुख्यधारा में लाने की यह कोशिश अगर विफल होती है तो शायद फिर कोई इंद्रेश कुमार हमें ढूंढना मुश्किल होगा। इंद्रेश कुमार जैसे लोगों के इरादे पर शक करके हम वही काम कर रहे हैं जो मुहम्मद अली जिन्ना और उनकी मुस्लिम लीग ने किया था जिन्होंनें महात्मा गांधी को एक हिंदू धार्मिक संत और कांग्रेस को हिंदू पार्टी कहकर लांछित किया था। जो काम 1947 में मुस्लिम लीग ने किया, वही काम आज कांग्रेस की सरकारें कर रही हैं। राष्ट्र जीवन में ऐसे प्रसंगों की बहुत अहमियत नहीं है किंतु इंद्रेश कुमार की सफलता को उनके अपने लोग भी संदेह की नजर से देखते थे। वे सरकारें जो आतंकी ताकतों से समझौते के लिए उनकी मिजाजपुर्सी में लगी हैं, जो कश्मीर के गिलानी, मणिपुर के मुइया और अरूघंती राय जैसों के आगे बेबस हैं, वे इंद्रेश कुमार को लेकर इतनी उत्साहित क्यों हैं?

बावजूद इसके कि इंद्रेश कुमार एक गहरे संकट में हैं, पर इस संकट से वे बेदाग निकलेगें इसमें शक नहीं। उन पर उठते सवालों और संदेहों के बीच भी इस देश को यह कहने का साहस पालना ही होगा कि हमें एक नहीं हजारों इंद्रेश कुमार चाहिए जो एक हिंदू संगठन में काम करते हुए भी मुस्लिम समाज के बारे में सकारात्मक सोच रखते हों। आज इस षडयंत्र में क्या हम इंद्रेश कुमार का साथ छोड़ दें ? इस देश में तमाम लोग हत्यारे व हिंसक माओवादियों और कश्मीर के आतंकवादियों के समर्थन में लेखमालाएं लिख रहे हैं, व्याख्यान दे रहे हैं। उन्हें रोकने वाला कोई नहीं है। क्या इंद्रेश कुमार जिनसे मैं मिला हूं, जिन्हें मैं जानता हूं, उन्हें इस समय मैं अकेला छोड़ दूं और यह कहूं कि कानून अपना काम करेगा। कानून काम कैसे करता है, यह जानते हुए भी। जिस कानून के हाथ अफजल गुरू को फांसी देने में कांप रहे हैं, वह कानून कितनी आसानी से हिंदू-मुस्लिम एकता के इस प्रतीक को अपनी फन से डस लेता है, उस कानून की फुर्ती और त्वरा देखकर मैं आश्चर्यचकित हूं। मैं भारत के एक आम नागरिक के नाते, हिंदू-मुस्लिम एकता के सूत्रधार इंद्रेश कुमार के साथ खड़ा हूं। आपको भी इस वक्त उन्हें अकेला नहीं छोड़ना चाहिए।
October 26th, 2010 | Tags: इन्‍द्रेश कुमार | Category: जरूर पढ़ें, राजनीति | Print This Post Print This Post | Email This Post Email This Post | 301 views
26 Responses to “जिस इंद्रेश कुमार को मैं जानता हूं !!”

Pages: [3] 2 1 » Show All

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girish juyal Says:
October 28th, 2010 at 9:34 pm

इन्द्रेश जी ने सिर्फ मुस्लिम को ही नहीं दलित की आवाज़ को भी अभिव्यक्ति दी ,तिब्बत की मुक्ति , नेपाल को मऊवाद से बचाकर लोकतंत्र को इस्थापित करने मे भूमिका निभाई ,कश्मीर की आसली आवाज़ भारत व् विश्व सुनाई ,भारत मे सीमा पार से आने वाले विदेशी धन ,नशीली पधार्थ ,हथियार पर हिमालय परिवार इस्थापित किया जिनको इसकी हानि हो ररही हे वे केवल इन्द्रेश जी के ही नहीं देश के भी दुश्मन हे .गिरीश जुयाल
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Bikash K Sharma Says:
October 28th, 2010 at 7:29 pm

Bhai Pradeep ki Batton se lagta hai ki woh kisi khanche me bandhe hue hain or sirf wahi duniya ko dikhana chahte hai jo wo dekhte hain.lage raho bhai….

- Bikash K Sharma
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saurabh Says:
October 28th, 2010 at 2:29 pm

संजय सर आप की बात से में सहमत हू…और एक बात ये कहना चहुँगा की मैं भी जिस इन्द्रेश जी को जनता हू…वो ये तो नहीं ही हो सकते …जो वयेक्ति अपने पूरे लगन और निष्ठां क साथ गंगा जमुना सस्कृति को जोड़ने क लिए लगा हो वो ऐसा कार्य कर ही नहीं सकता…और दूसरी बात तो ये है की सघ के प्रचारक तो राष्ट्र को परंवैभव पर पहुचने का संकल्प ले कर निस्वार्थ भाव से सेवा करते है..वो एषा कर ही नहीं सकते…जहा तक मुझे लगता है ki इन दिनों कांग्रेस तमाम समस्याओ से घिरी पड़ी है…और लोगो के कोप का भागी बन रही है….इसी लिए वो लोगो का धयान बाटने के लिए इस तरह का काम भी कर रही है……जो निंदनीय है…….. सौरभ मिश्र

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pawan singh Says:
October 28th, 2010 at 11:41 am

जिस इंसान ने अपनी जिंदगी के ४० साल देश और समाज के लिए लगा दिए हो उस वयक्ति के ऊपर इस प्रकार के आरोप से केवल राजनीति की बू ही आती है आज समाज को एक नहीं हजारो इन्द्रेश कुमारो की जरुरत है हम सब हर प्रकार से उनके साथ है भारत माँ की सेवा का प्रण जिन भी देशभक्तों ने लिया है उन को इन तकलीफों से तो गुजरना ही पड़ता है क्योकि :

“यू ही नहीं इस देश मैं, खुशियों के चमन खिलते है,
जरा आँख उठा कर देख ए विश्व, यहाँ दीप नहीं जीवन जलते है “
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प्रभात कुमार रॉय Says:
October 28th, 2010 at 5:58 am

दरअसल यह सारा मामला और गहराई के साथ जांच पडताल चाहता है। किसी मुलजिम की डायरी में किसी शख्‍स का नाम लिखे होने से उसे उसके साथ कैसे फंसाया जा सकता है । इंद्रेश जी का सारा केस इसी बिंदु पर टिका हुआ है। हूकुमत आरएसएस के नेतृत्‍व को आतंकवादी करार देने पर आमादा हो रही है अत: वही सब बाकायदा किया जा रहा है। सीबीआई ने अपनी विश्‍वसनीयता खो दी है। सीबीआई केंद्र सरकार के इशारे पर नृत्‍य करने वाली वाली ऐजेंसी बन कर रह गई है। हवाला मामला इसका सबसे अहम उदाहरण है कि कैसे महज जैन डायरी के आधार पर निर्मित केस की धज्जियां कोर्ट में उड़ गई और सभी मुलजिम बाइज्‍जत बरी कर दिए गए।
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Pradeep arya Says:
October 28th, 2010 at 12:46 am

वी के शर्मा जी आर एस एस कब अपने कार्यकर्ता के आगे पीछे नहीं रहा.. मा. इन्द्रेश जी के पक्ष में पूर्व सर संघ चालक जी ने अपना वक्तव्य मीडिया में दिया हे और संघ एवं उसके कार्यकर्ता एसा घ्रणित कार्य कभी नहीं करते तो इसमें डरने की क्या बात हे कुछ आरोप हम पर लगा दिए तो समझो देशद्रोही दर अगये हैं बोखला गए हैं संघ कार्य से … संघ का कार्य ईश्वरीय कार्य हे..और संघ के कार्यों को समाज जनता है.. जब समाज में कोई विरोधी प्रतिक्रिया नहीं तो सम्माज के लोगों का संघ कार्य पर आज भी भरोसा है.. संघ के कार्य कर्ताओं के लिए तो इसे कंटक पथ अनेक मिले हें और मिलते रहेंगे..इसकी प्रमाविकता का कोई पर्याय नहीं है.. तो क्यों इसका स्पष्टि कारन देकर अपना समय व्यर्थ गंवाया जाये ..शर्मा जी आपकी सोच गलत ही नहीं आधूरी भी हे… संघ आज भी कार्यकर्ताओं के कार्यों और चरित्र पर टिका हे… आपकी सोच का क्या कारन हे कृपया बताने का कास्ट करें…
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shishir chandra Says:
October 28th, 2010 at 12:30 am

दिवस दिनेश गौर जी समर्थन के लिए धन्यवाद. राष्ट्रवादी शक्तियों पर हमला कोई नई बात नहीं है. असल में इन आसुरी शक्तियों के पास अपार धन होता है और इनका पैसा ही बोलता है. ये सब चीजों को खरीद लेते हैं या जुगाड़ लेते हैं. हमें इनसे सावधान रहना होगा. यदि इन्द्रेश जी ने खूब पैसे बनाये होते तो शायद किसी की हिम्मत नहीं होती इन पर कीचड उछालने की. चाहे इन्होने कोई भी अपराध किया होता.
दूसरा दोष धारा के विपरीत बहना है. इन्द्रेश जी ने जो काम किया वो उनके कई दुश्मन पैदा करता है. इससे इन्द्रेश जी को ऐसी परेशानी होना ही था.
यदि इन्द्रेश जी सेकुलर खेमे में होते तो बड़े लीडर कहलाते और कोई भी उनका बाल भी बांका नहीं कर पता.
पैसों के बल पर आजकल वोट बैंक भी मंबूत होते हैं. इन्द्रेश जी इमानदार होने की वजह से फँस गए.
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rita jaiswal Says:
October 27th, 2010 at 9:13 pm

निस्वार्थ और निश्चल भावना के साथ भारत माँ के चरणों में अपना जीवन अर्पित करने वाले एक युग पुरुष का नाम है इन्द्रेश . हिमालय को भी शीत में कठोर थपेरो को झेलना पड़ता है पर इससे उसकी सुन्दरता और भी उभरती है .
इस बे बुनियाद और मन गढ़िथ आरोप के आधार पर सरकार देश को गुमराह करने की कोशिश कर रही है. भारत की जनता मुर्ख नहीं है और मीडिया द्वारा दिखाई जा रही एक तरफ़ा कहानी पर कोई विश्वाश नहीं करेगा.
इन्द्रेश जी आप निडर और अडिग रह कर अपने सच्चाई के पथ पर बने रहिये क्यूंकि भारत के अगले चमकते सूरज आप ही है.
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Well wisher Says:
October 27th, 2010 at 9:05 pm

आम इंसान आज भी शांति पसंद है, और शांति चाहता है. हम एक बहुजातीय, बहुभाषीय, बहुधर्मीय देश भारत के नागरिक हैं, और यह हमरा धर्म है की अपनी एकता और अखंडता को शांति और प्रेम सन्देश से बचाएं.
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17
jai kumar jha Says:
October 27th, 2010 at 7:20 pm

अजित गुप्ता जी की टिपण्णी से सहमत हूँ…

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Monday, October 25, 2010

यह ·कैसा राज्योत्सव ???

यह ·कैसा राज्योत्सव ???

सुन ले मोर गोठ छत्तीसगढ़ राज ल बने दस साल पूरा होने वाला है। आउ समारू अपना सभी संगी साथी ·े साथ मिल·े भी शराब ठे·ादार ·े दू·ान ला छत्तीसगढ़ महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ठा·ुर प्यारेलाल सिंह अउ छत्तीसगढ़ राज्य आंदोलन के नेतृत्व ·रता सहित्यकार हरि ठाकुर के प्रतिमा के पास से नहीं हटा पावत हैं। दम नहीं है देवांगन बंधु मन ता·क त दिखाइस तो आजाद चौ·क पुलिस में अपराध ·कायम होगे अब ·कार में तात है। ·हागे हमर छत्तीसगढिय़ा साथी संगी जवान अऊ पहलवान साथी मन हा छुपगे है। छत्तीसगढ़ आजाद फौज,छत्तीसगढ़ टाइगर्स, छत्तीसगढ सेना,छ्त्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा,छत्तीसगढ़ संग्राम परिषद,छत्तीसगढ़ राज्य अंखड धरना चलाने वाला दाउ आनंद कुमार

डॉ. उदयभान सिंह चौहान। यह राज्योत्सव छत्तीसगढिय़ा मन के नहीं है। यह तो चोर ठे·केदार,भ्रष्ट अधि·कारी मन ·के है। मोर मन में जो बात रहिस तेन ला मे लिख दे हांव अब देखना है ·की आगे चल·कर · होई,दस साल पहले ए· बार हमन ला ए· होकर छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण बर लड़ाई ·रना पड़े रहीस अब छत्तीसगढ़ ·के अस्मिता बर लड़ाई लडऩा पड़ी। सवाल ए· दारू दूकान के नहीें है। सवाल अपन राज्य ·के है। जहां हमर राज नहीं चलत है मतलब पब्लिक · जनता ·के चिंता ·कोई नहीं रहता है। अफसर अउ नेता मन मिल·के जेब भरत है। शराबी मन के पैसा पंजाब जावत है।

Wednesday, October 20, 2010

केंद्री मंत्री की सुपारी छह सौ में


अमीर धरती गरीब लोग वाले अनिल भैय्या ने कहा था कि कभी सच लिखना हो तो ब्लाग पर लिखो वहीं हम सबके बीच ब्लांग को आज का आंदोलन बताने वाले अवारा बंजारा के संजीत त्रिपाठी की भी यहीं राय रही है कि ब्लांग में समाचार नहीं विचार लिखो चलो अपने निजी लेकिन हजारो लाखो छत्तीसगढ़िया के मन के गोठ याने विचार लिख देता हुं।

राय स्थापना दिवस भी आ रहा है। छत्तीसंगढ़ में बेरोजगारी बढ़ गई है यहीं कारण है कि यहां हर कोई सस्ते में आदमी मांगता है। छॉलीवुड के कलाकार से लेकर अखबारो के पन्ने रंगने वाले धांसू कलमकार यहां सस्ते में मिल जाते हैं। हरियाणा हो या राजस्थान सभी को यहां सस्से में मजदूर मिलते हैं। इस लिए जोर से बोलो छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया,,,,सबसे मजे की बात यह है कि कोचिया (दलाल) भी मौजूद है। कम दर में बात कर बेहतर काम करवाने का दावा करते हैं। खैर फिर भी जय छत्तीसगढ़...जय जौहर,,,,

बहारहाल हम इस गंदगी को बाद में कोसेगें। लेकिन हाल ही में प्रदेश कांग्रेस कार्यालय (गांधी मैदान)में हुए कालिख कांड की सुपारी की कीमत ने अब यहां के गुंडे बदमाशो की कीमत भी कम कर दी है। जिससे अब क्रांतिकारी किस्म के युवक यह भी नहीं कह सकते कि अगर कोई काम धाम नहीं मिला तो भाई बन जाएगें।

भाई हां मुंबई के भाई । भाई की कीमत यहां गिर गई है भाई।

छत्तीसगढ़ में गुंडागर्दी की कीमत में गिरावट भी अपराध जगत के लिए चिंता जनक है। यह समाज शास्त्रीयों के लिए सोचने की बात है। लेकिन एक ताजा घटना की ओर जाएगें तो गुंडा गर्दी की कीमतमुंबई,दिल्ली,यूपी,बिहार,राजस्थान,हरियाणा के मुकाबले छत्तीसगढ़ में कम है। केन्द्रीय मंत्री और छत्तीसगढ़ प्रभारी वी नारायण सामी पर नारेबाजी कर कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओ और उनके संडे मुसंडे सुरक्षा कर्मियों के सामने कालिख फेकने वाले युवको ने एर नजर में तो साहस का काम किया है। लेकिन यह साहस शांत छत्तीसगढ़ को शूट नहीं करती है। यहां मेहमा जो हमारा होता है वह जान से प्यारा होता है।

बहारहाल पुलिस को पूछताछ में बताया कि पप्पू फरिश्ता नामक कांग्रेसी (तथाकथित) नेता ने उन्हें मात्र छह सौ रुपए दिए हैं। पकड़े गए आरोपियों की संख्या करीब छह है। इससे लगता है कि सौ रुपए की रोजी में यहां असामजिक तत्व मिलते हैं। अब समझ में आया नक्सलवाद छत्तीसगढ़ में क्यो फल फूल रहा है। नेताओं को चिंता करना चाहिए अगर बेरोजगारी का यहीं हाल रहा तो उन्हें सस्ते में गुंडे बदमाश तो मिल जाएगें। लेकिन इस सस्ती सुपारी में उनकी ही जान पर खतरा मंडराएगा। है न बात पते की। खैर अब आने वाला समय ही बताएगा। छत्तीसगढ़ में मजदूरी की कीमत बढ़ती है कि नहीं बहारहाल दो अखबार भी अपना सर्कुलेशन बढ़ाने के लिए मारपीट पर उतर गए हैं।

खैर छत्तीसगढ़ियों को प्रदेश के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ठाकुर प्यारे लाल सिंह और राय निर्माण आंदोलन में अहम भूमिका निभाने वाले उनके बेटे सहित्कार हरि ठाकुर की प्रतिमा के पास जिलाधीश महोदय के अनुमति से शराब ठेकेदार द्वारा शराब दूकान और चखना सेंटर खोल दिया गया है। इसके विरोध में एक बड़ी रैली निकालनी पड़ी है।

जहां हम लोग एक और राय स्थापना दिवस मनाने जा रहे हैं। वहीं हमें इस शर्म से भी डूबना पड़ रहा है कि छत्तीसगढ़ियों का आखिर होगा क्या।

पर नारेबाजी कर कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओ और उनके संडे मुसंडे सुरक्षा कर्मियों के सामने कालिख फेकने वाले युवको ने एर नजर में तो साहस का काम किया है। लेकिन यह साहस शांत छत्तीसगढ़ को शूट नहीं करती है। यहां मेहमा जो हमारा होता है वह जान से प्यारा होता है।

बहारहाल पुलिस को पूछताछ में बताया कि पप्पू फरिश्ता नामक कांग्रेसी (तथाकथित) नेता ने उन्हें मात्र छह सौ रुपए दिए हैं। पकड़े गए आरोपियों की संख्या करीब छह है। इससे लगता है कि सौ रुपए की रोजी में यहां असामजिक तत्व मिलते हैं। अब समझ में आया नक्सलवाद छत्तीसगढ़ में क्यो फल फूल रहा है। नेताओं को चिंता करना चाहिए अगर बेरोजगारी का यहीं हाल रहा तो उन्हें सस्ते में गुंडे बदमाश तो मिल जाएगें। लेकिन इस सस्ती सुपारी में उनकी ही जान पर खतरा मंडराएगा। है न बात पते की। खैर अब आने वाला समय ही बताएगा। छत्तीसगढ़ में मजदूरी की कीमत बढ़ती है कि नहीं बहारहाल दो अखबार भी अपना सर्कुलेशन बढ़ाने के लिए मारपीट पर उतर गए हैं।

खैर छत्तीसगढ़ियों को प्रदेश के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ठाकुर प्यारे लाल सिंह और राय निर्माण आंदोलन में अहम भूमिका निभाने वाले उनके बेटे सहित्कार हरि ठाकुर की प्रतिमा के पास जिलाधीश महोदय के अनुमति से शराब ठेकेदार द्वारा शराब दूकान और चखना सेंटर खोल दिया गया है। इसके विरोध में एक बड़ी रैली निकालनी पड़ी है।

जहां हम लोग एक और राय स्थापना दिवस मनाने जा रहे हैं। वहीं हमें इस शर्म से भी डूबना पड़ रहा है कि छत्तीसगढ़ियों का आखिर होगा क्या।

ये छत्तीसगढ़ है बाबू ,अमीर धरती,गरीब मनखे,,

Saturday, October 16, 2010

Thursday, October 14, 2010

Saturday, August 14, 2010

Sunday, April 4, 2010

बच्चा बच्चा राष्ट्र का,मातृ भूमि के काम का


टेनिस खिलाड़ी सानिया मिर्जा का पाकिस्तान प्रेम इस बात की पहचान है कि भारत और उसके धर्म संस्कृति भारतीय परंपरा को खत्म करने का सपना देखने वाले पाकिस्तान जैसे दुश्मन देश के प्रति मुस्लिम सोच क्या है। लेकिन सिर्फ सानिया मिर्जा जैसे कपूतो के कारण हम अपने भारतीय मुसलमानो को प्रति पूरी तरह नफरत नहीं कर सकते हैं। भारत में सभी मुसलमान इस मानसिकता के नहीं है कि खाओ भारत का गाओ पाकिस्तान का आज भी मुसलमानो के शरीर में 1857 के महान क्रांतिकारी बहादुर शाह जफर और दूसरी बार हुई क्रांति के शहीद अशफाक उल्ला खान जैसे महान देश भक्त मुसलमानो का खून दौड़ रहा है। शिव सेना सुप्रीमो बाला साहेब ठाकरे की आपत्ति के बाद पूरे देश में भगवा ब्रिगेड ने भी राष्ट्र हित में प्रदर्शन शुरु कर दिया है।
सनिया मिर्जा एक राष्ट्रीय खिलाड़ी है। वह देश की शान है। वह अपनेे अम्मी और अब्बू की बेटी नहीं बल्कि पहले वह देश की बेटी है। इसके बाद वह मुस्लिम समाज की बेटी है। इसके बाद वह हैदराबाद की बेटी इन सब के बाद वह अंत में अपने अम्मी और अब्बू की बेटी है। पाकिस्तानी खिलाड़ी से शादी करना कोई गुनाहा नहीं लेकिन जिस देश की सत्ता ने आतंकवाद को बढ़ावा देते हुए लाखो निर्दोष लोगो की जान लेकर कई मांगे को सूनी कर मासूमों को अनाथ कर दिया है। उस देश के साथ रिश्ता करना भारत की बेटी को शोभा नहीं देती है। भारत में बच्चा किसी भी प्रदेश में किसी भी शहर में किसी भी समाज और धर्म में हो वह बच्चा पहले राष्ट्र की धरोहर है। याने की बच्चा बच्चा राष्ट्र का ,मातृ भूमि के काम का अब यह बात अलग है कि वह राष्ट्र की सेवा किस रूप में करता है। जवान बनकर किसान बनकर अभिनेता बनकर या फिर नेता बनकर या फिर मामूली क्र्लक बनकर या फिर बेरोजगार बनकर वह है तो राष्ट्र की धोरहर और मातृ भूमि के काम का है।
बहुत से खतरनाक लोग (बुध्दिजीवी वर्ग) सानिया के पाकिस्तान खिलाड़ी शोयब अख्तर से शादी को गलत नहीं बताते लेकिन सिर्फ उनकी बेटी और बेटे के रिश्ते को दूसरे समाज धर्म में करने की बात करते ही आप का कलर पकडऩे को तैयार हो जाएगें। इसका एक आप अपने आसपास रहने वाले किसी बुध्दिजीवी के साथ इसका अभ्यास करके आप बड़े ही आसानी के साथ देख सकते हैं।
भारतीय मुसलमानो में क्या योग्य वर नहीं है। क्या भारत के मुस्लिम समाज में सानिया मिर्जा को शादी करने से पब्लिसिटी नहीं मिलेगी। पूरे देश में शिव सेना ,भाजपा ने सानिया की मूर्खता पर मोर्चा खोल रखा है। इस बात से सिर्फ हिन्दू संगठन ही नहीं बल्कि मुस्लिम समाज में भी रोष है। अनेक मुस्लिम नेताो ने सानिया के इस निर्णय की निंदा की है। लेकिन देश वासियो का दिल दुखा कर जाने वाली लोकप्रिय टेनिस खिलाड़ी के साथ क्या होने वाला है यह तो वक्त ही बताएगा।

Tuesday, March 16, 2010

बच्चे नक्सलियों से नहीं मीडिया से डर गए


नक्सल प्रभावित इलाके से आए बच्चे किसी न किसी पीड़ा से गुरुकुल आश्रम में रह रहे है। इस आश्रम का कार्य उस समय सही ढंग से शुरु हुआ जब तत्कालीन डीजीपी ओपी राठौर ने नक्सली हिंसा में पीड़ित और दहशत में डूबे अनाथ बच्चो को यहां रखवाने में मदद की थी। लगभग तीन साल बाद आश्रम में घटे घटना और स्टींग आपरेशन के बाद हुए विवाद में आश्रम के बच्चो में एक बार फिर चार साल पुराना खौफ छा गया। यह खौफ नक्सलियों का नहीं था। बल्कि उस मीडिया का था। जिनका कैमरा उनके आंसू कैद कर मार्मिक स्टोरी पेश कर उन्हें अपना हथियार बना रहा था। किसी को गिनती में बच्चे कम मिल रहे थे। किसी को भूखे लग रहे थे। किसी को भयभीत लग रहे थे। जबकि हकीकत यह है कि अपनी नौकरी बचने और खबरो की तलाश में भटके मीडिया कर्मी सच से कोसो दूर खड़े नजर आ रहे थे। बच्चो से बिना जाने दंतेवाड़ा में हंगामा हो गया। हिमांशु कुमार को भी चिंता हो गई। एक वरिष्ठ पत्रकार से रहा नहीं गया उन्होंने हिमांशु कुमार से बात कर बच्चे कम होने का बवाल भी खड़ा कर दिया। बच्चा पहले दिन से ही मिडिया को यह कम मिल रहे है। पहले दिन दो बच्चे गायब थे। बाद में समाज कल्याण विभाग ने सभी बच्चे होने की पुष्टि कर दी। एक बार मिडिया की खबर फिर झूठी हो गई। इसके चार दिन बाद दंतेवाड़ा कलेक्टर के आने पर नंबर वन अखबार के नंबर वन रिर्पोट को पता नहीं किसने कलेक्ट्रेर के हवाले से 16 में 15 बच्चे मिलने की सूचना दी। एक बच्चा कम होने का हल्ला मचा। 24 घंटे बाद कलेक्टर ने स्वंय अखबार के दफ्तर में फोन कर बताया कि एक भी बच्चा कम नहीं है। बच्चे भी अखबार की खबर और चैनल की रपट देखकर घबरा रहे है। पता नहीं कौन उनसे कैमरा टिकाकर क्या पूछेगा और कल क्या दिखाएगा और क्या बताएगा।

Friday, February 26, 2010

खान बंधु फिल्मे बनाने से काम नहीं चलेगा

सैफ अली खान की फिल्म कुर्बान और शाहरूख खान की फिल्म माइ नेम इज खान दोनो ही फिल्मों में मुस्लिम समाज केप्रति विदेशो में पैदा हुए नफरत को बताया गया है। दोनो ही फिल्में तरीफ कबिल है। शाहरूख खान और सैफ अली खान की एक्टिंग दिल को छु लेने वाली है। लेकिन माइ नेम इज खान में शाहरूख खान उर्फ रिजवान खान ने पूरी फिल्म में बड़े ही मार्मिक रोल के साथ कहा है कि माइ नेम इज खान आई एम नाट टेरिरिस्ट मै नहीं हूं आतंकवादी हर खान आतंकवादी नहीं पर आतंकवादी खान है इस बात को हम तभी नकार सकते है जब गलतियो में फतवा जारी करने वाला इस्लाम आतंकवादियों के खिलाफ उनके जेहाद नामक आतंकी आंदोलन के खिलाफ फतवा जारी करने का समय आता है तो चुप बैठ जाता है। ओसम बिन लादेन को खलनायक मानने के बजाए उसे नायक समझा जा रहा है। मुस्लिम समाज खुलकर तलिबान के खिलाफ नारे लगाने से कतराता है। हालांकि मुस्लिमो की राष्ट्रभक्ति पर जरा भी संदेह नहीं किया जा सकता है। लेकिन भारतीय सिनेमा के मुस्लिम कलाकार शाहरूख खान और सैफ अली खान ने अपने दोनो ही फिल्म मेें अमेरिका में हुए आतंकी हमले के बाद आम मुस्लिमो के खिलाफ फैली नफरत को अपने अभिनय के माध्यम से दर्शाते है। मुसलमान होना कोई गुनाहा नहीं लेकिन इस्लाम की आड़ लेकर आतंकवाद फैलाने वालो की पैरवी करना गुनाहा है। भारतीय सांसद में हमला करने वाले आतंकवादी अबजल गुरु को फांसी देने के लिए भारतीयो द्वारा किए जा रहे मांग के समर्थन में मुस्लिम समाज सड़को पर क्यो नहीं उतरता। आज मुस्लिम समाज के प्रति अन्दर ही अन्दर जो नफरत भारतीयो और विश्व के अन्य देशो में फैल रहा है उसके पीछे सिर्फ आतंकवाद है। 1857 से लेकर 1947 तक भारतीय मुसलमानो ने आजादी की लड़ाई में बढ़चढ़कर हिस्सा लिया। आजादी की पहेली लड़ाई में बहादुर शाह जफर की कुर्बानी भुलाई नहीं जा सकती है। वहीं देश के लिए कुर्बान हुए अमर शहीद अशफाक उल्ला खान के त्याग को भुलाया नहीं जा सकता है। लेकिन अब समय आ गया मुस्लिम समाज दूसरे वर्ग के नफरत से बचने के लिए आतंकवाद का खुलकर विरोध करे। आतंकवादी चाहते है मुस्लिम नफरत से देखे जाए और फिर उनके साथ दूसरे कौम के खिलाफ जेहाद में शामिल हो जाए। उनकी पूरी कोशिश है कि मुस्लिम समाज पूरे विश्व में नफरत का शिकार होकर उनके खूनी संघर्ष में शामिल हो जाए। अब यह मुसलमानो के हाथ में है कि वह आतंकवादियों के चाल के शिकार हो या फिर आतंकवादियों के खिलाफ मोर्चा खोले। सिर्फ फिल्में बनाकर दिखाने से समाज में कोई परिवर्तन नहीं आने वाला है।

Monday, February 15, 2010

खाओ भारत का ,गाओ पाकिस्तान का


वादेमातरम। 13 फरवरी की शाम पुणे में हुए बम धमाको से केन्द्र सरकार और स्वंय को बुद्धिजीवी कहने और खेल भावना वाले शहरुख खान समर्थक जान ले कि पाकिस्तान जैसे आतंकवादी देश के साथ हमदर्दी दिखाने का क्या खम्यिाजा भुगतना पड़ता है। भारत तभी तक धर्मनिरपेक्ष है जब तक यहां हिन्दू बहुसंख्यक है। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने अपने गीता सार में लिखा था कि दुष्ट व्यक्ति के साथ दुष्टता से ही निपटा जा सकता है। सज्जनता वहां काम नहीं आती। लेकिन शाहरुख खान और उन जैसे खेल भावना वालो को कौन समझाए। देश को आतंकवादी ताकतो के हाथ में सौपने वाले बुद्धिजीवियों से अब डर लगने लगा है। मराठी हदय सम्राट शिव सेना सुप्रीमो बाला सहाब ठाकरे का बयान जैसा भी रहा हो लेकिन शाहरुख खान का बयान भी तरीफ के काबिल नहीं है। खाता भारत की है गाता पाकिस्तान की है। खैर शाहरुख की जिद देश से बड़ी नहीं है। पाकिस्तान के खिलाफ भारतीयो को भी नफरत दिखानी होगी। नहीं तो सज्जनता इस्लामिक आतंकवाद के सामने टिक नहीं पाएगी। बुद्धि जीवियों और खेल भावना वाले महापुरुषो की बात मानकर देश चले तो पाकिस्तान देश में आतंकवादी घटनाओ को श्रेय देता रहे और हम सिर्फ हिंदु मुस्लिम सिख ईसाई आपस में है भाई भाई कहकर लोकतंत्र की दुहाई देकर होटल ताज के हमले को एक बार फिर आमंत्रण दे दे। क्योकी इस देश को शाहरुख खान और उसके चाहने वाले दर्शक चलते है। इनके साहस की जितनी तरीफ की जाए कम है पुलिस की कड़ी सुरक्षा में माई नेम इज खान देखने जाते है। इन्हें टॉकीज में तोड़फोड़ होने का डर नहीं है। मुठ्ठीभर राष्ट्रवादी देश के बहुसंख्यक बुद्धिजीवियों का कुछ नहीं बिगाड़ सकते है। फिर सरकार भी उनके साथ है क्यो न हो लोकतंत्रिक जनता है। पुलिस जवानो की विधवाओ के आंसू पोछने भले ही नहीं जा पाएगी। कारगिल की लड़ाई भूल जाएगी। लेकिन कड़ी सुरक्षा में माइ नेम इज खान देखेगी। पहले भी भारत देश नाच गाना सुनने वाले और मनोरंजन की दुुनिया में खोने वाले राजा महाराजा नवाबो के कारण गुलाम हो चुकी है। अब फर्क बस इतना है कि अब राजा महाराजा नवाब नहीं रहे यहां की जनता ही आजादी पाकर इनका इतिहास रचने जा रही है। कला भावना और खेल भावना से देश को गुलाम करने जा रही है।

Wednesday, February 10, 2010

भूमकाल दिवस,नक्सलियों के खिलाफ खुला मोर्चा

रायपुर बीस साल बाद बस्तर में भूमकाल दिवस पर आदिवासी ग्रामीणों ने नक्सलियों के शोषण और दमन के खिलाफ लड़ाई लड़ने की घोषणा करते हुए हिंसक माओवादी विचारधारा के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया है। पिछले महीने स्कूली छात्रो की गला रेतकर की गई हत्या के बाद से ग्रामीणों में नक्सलियों के प्रति घृणा जाग गई है। इसका असर भूमकाल दिवस पर देखने को मिला। ब्रिटिश काल में आदिवासियों ने अंग्रेजी हूकूमत के खिलाफ बिगुल फूकते हुए लड़ाई छेड़ी थी। इस लड़ाई को भूमकाल नाम दिया गया। आजादी के बाद से लगातार 10 फरवरी को बस्तर में भूमकाल दिवस मनाया जाता है। जगदलपुर में मनाए जा रहे भूमकाल दिवस के मौके पर पहली बार आदिवासी समाज ने नक्सलियों के खिलाफ लोकतंत्रिक तरीके से लड़ाई जारी रखने की घोषणा करते हुए शोषण के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाले शहीद गुंडाधूर,डेवरी धु्रव सहित आजादी की लड़ाई में शहीद हुए अन्य शहीदो को याद किया। इस मौके पर पुलिस विभाग द्वारा लगाए गए नक्सल विरोधी जनजागरण शिविर में आदिवासी जनता ने हिस्सा लिया और भारी संख्या में नक्सल विरोधी पर्चे और पोस्टर का कार्यक्रम स्थल में वितरण किया गया। इस मौके पर एसपी पी सुंदरराज भी ग्रामीणो ने आदिवासी समाज के जवान बच्चे और छात्र छात्राओं को नक्सली द्वारा अपने लड़ाई में शामिल किए जाने का विरोध करते हुए नक्सली शोषण के खिलाफ मोर्चा खोलने का आव्हान किया है। सूत्रों के मुताबिक अब तक भूमकाल दिवस के मौके पर नक्सली समर्थक नेता ग्रामीणों को दिग्भ्रमित करते हुए सरकार को शोषक बताती आई थी। खासतौर से नारायणपुर में पिछले महीने दो स्कूली बच्चो की गला रेतकर हत्या किए जाने के मामले में नक्सलियों की जमकर निंदा की गई है।

अब सीबीआई करेगी बाबूलाल से पूछताछ

। रायपुर आयकर छापे के बाद कृषि सचिव बाबूलाल अग्रवाल और उनके पीए सुनील अग्रवाल द्वारा बयान बदला गया। आयकर अफसरो को जांच में मदद नहीं किए जाने और राष्ट्रीयकृत बैंक अफसरो के साथ मिली भगत कर किए गए करोड़ो रुपए के निवेश के मामले में आयकर विभाग ने यह प्रकरण बुधवार की शाम सीबीआई को सौप दिया। अब इस मामले में जांच का नेतृत्व सीबीआई करेगी। आयकर विभाग भोपाल के महानिदेशक (अन्वेषण) बृजेश गुप्ता ने बताया कि बुधवार को दिनभर बैक आंफ बड़ौदा में आयकर अफसरो द्वारा जांच पड़ताल की गई है। यहां के लाकर्स से 15 लाख रुपए नगद बरामद हुए है। यह लाकर्स पहले कृषि सचिव बाबूलाल अग्रवाल के नाम पर था। वर्तमान में इसे उनके भाई पवन अग्रवाल के नाम पर कर दिया गया है। आईएएस अफसर द्वारा किए गए कर चोरी के मामले में राष्ट्रीय कृत बैंक के अफसरो की भी मिली भगत का मामला सामने आ रहा है। इसे देखते हुए मामला सीबीआई को सौप दिया गया है। अब इस मामले में राज्य आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो,आयकर इन्वेस्टीगेशन सेल सहित सीबीआई जैसे देश की सर्वोच्च जांच एजेसीं भी जांच पड़ताल और आईएएस अफसर बाबूलाला अग्रवाल से पूछताछ करेगी। इस मामले में सीए सुनील अग्रवाल द्वारा भी आयकर अफसरो के खिलाफ दबाव डालने का शपथ पत्र अफसर को दिया गया था। इस पूरे मामले में आयकर अफसरो पर पलटवार करने की मंशा को देखते हुए आगे की जांच पड़ताल का नेतृत्व सीबीआई को सौप दिया गया है। बाक्सग्रामीण करेगे जांच एजेंसियों को मदद राजधानी से लगे खरोरा इलाके के मूल निवासी सीए सुनील अग्रवाल द्वारा गांव के लोगो का फर्जी तौर पर बैंक खाता खोला गया था। इस मामले में 28 ग्रामीण सीए सुनील अग्रवाल सहित उसके अस्टिेंट अलोक अग्रवाल और यूनियन बैंक के अधिकारी कर्मचारी के खिलाफ धोखाधड़ी कर उन्हें निवेश कंपनी में फर्जी तौर पर ज्वाइंट डायरेक्टर बनाए जाने और उनके नाम से फर्जी खाते खोले जाने के मामले में अपराध कायम करवाने वाली है। बताया जाता है कि इनके खाते से लाखो रुपए का लेनदेन हुआ है। इन्हें खाते और रकम के बारे में आयकर अफसरो से जानकारी मिल पाई है। आयकर विभाग के सूत्रो के मुताबिक छापे की कार्रवाई के दौरान ही बैंक अफसरो ने साक्ष्य मिटाने का कार्य किया है। बैंक में लगे विडियो फूटेज में 1 से 9 फरवरी का रिकार्ड गायब है।

Saturday, February 6, 2010

बाबूलाल ने ग्रामीणों को banaya karorpati

रायपुर आईएएस अफसर बाबूलाल से भी ज्यादा चालक उनका सीए निकला जिसने अपने गांव के ग्रामीणों को इंकमटैक्स फाइल बनाने के नाम पर औपचारिकता पूरी करवाई और उनके नाम से बैंक में फर्जी खाते खोलकर अफसर के ब्लैक मनी को व्हाइट मनी में तब्दील कर दिया। आयकर अफसरो द्वारा फर्जी पासबुक की में दर्ज नाम के आधार पर खरोरा में शिविर लगाकर करोड़पति ग्रामीणों का साक्षत्कार लेना पड़ा तब जाकर खेत में काम कर रहे ग्रामीणों को पता चला कि वह करोड़पति हैं। उनके नाम से एक बड़ा उद्योग समूह चल रहा है। जिसमें वह ज्वाइंट डायरेक्टर हैं। कृषि सचिव बाबूलाल अग्रवाल के सात ठिकानो में छापेमार कार्रवाई करने वाले आयकर अफसरो को जब सीए सुनील अग्रवाल के निवास और दफ्तर से ढेरो ऐसे दस्तावेज और बैंक पासबुक मिले जिसमें से 40 करोड़ रुपए इधर से उधर हुए थे। इसके आधार पर आयकर अधिकारियों का एक तीस सदस्यी दल दो शुक्रवार से खरोरा में डेरा डाले हुए था। लगभग 28 बैंक खातो के आधार पर खरोरा में पुलिस और कोटवार के मदद से पुकार लगाई गई,तो इसमें से अधिकांश करोड़पति की हैसियत रखने वाले अग्रवाल एंड कंपनी के साझेदार ज्वाइंट डायरेक्टर खेतो में काम करते नजर आए। आयकर अफसरो की पूछताछ में इन्हें जब पता चला कि इनके नाम से राजधानी के रामसागरपारा इलाके में स्थित यूनियन बैंक में खाते हैं। इसमें से लाखो रुपए इधर से उधर हुए है। तो गश खाकर गिर पड़े आयकर अफसरो ने जब उद्योगो में साझेदारी होने के दस्तावेज दिखाए तो बहुत का पसीना छूट गया। फर्जी बैंक खाते और अग्रवाल के कंपनी में साझेदारी करने वाले ग्रामीण जीवन लाल चंद्रकार,प्रीतम सिंग ठाकुर, समीर विश्कर्मा,भोला यादव, भूषण नायक ,धनजंय शर्मा ,दिपक धनगर सहित ने हरिभूमि को चर्चा करते हुए बताया कि लगभग पांच से छह साल पहले खरोरा निवासी सीए सुनील अग्रवाल और उसके रिश्तेदार अलोक अग्रवाल ने गांव के लोगो को इंकम टैक्स फाईल के महत्व को बताते हुए इंकम टैक्स फाइल मुफ्त में बनवाने का झांसा दिया था। इसके आधार पर गांव के सैकड़ो लोग औपचारिकाता पूरी कर इंकाम टैक्स फाइल बनाने के लिए तैयार हो गए थे। बाद में सब को इंकम टैक्स फाइल भी दी गई। इससे गांव के और भी लोग अलोक अग्रवाल के संपर्क में आए और इंकम टैक्स फाइल बनवाने की औपचारिकाता पूरी करने लगे। लेकिन अब अचानक आयकर अफसरो की खरोरा पहुंचने के बाद ऐसे 28 नाम सामने आए है। जिनके नाम से सीए सुनील अग्रवाल और उसके रिश्तेदार और अस्टिेट अलोक अग्रवाल ने रामसागरपारा स्थित यूनियन बैंक में फर्जी खाते खोलकर ब्लैक मनी को व्हाईट मनी में तब्दीलकर निवेश किया है। करवाई थी।

Thursday, February 4, 2010

छत्तीसगढ़ में बाबूलाल जैसे अफसर रहेगे तो नक्सलवाद तो पैदा होते रहेगा

छात्र राजनीति में पत्रकारिता में और कड़वा बोलने वाले रिश्ते से मेरे बड़े भाई लगने वाले अनिल पुसदकर की प्रेरणा से पहली बार अपने विचार ब्लाग में लिख रहा हूं ऐसे पिछले एक साल से में सिर्फ मै नक्सलवाद के खिलाफ समाचार ही लिख रहा हुं। पिछले दिनो अनिल भैय्या ने ब्लाग लिखने वालो से अपील की थी कि वह अपने विचार के साथ साथ अपने आसपास की घटनाओ का समाचार भी लिखे लेकिन यह मेरे ऊपर लागू नहीं होता था क्योकी मै तो पहले से ही समाचार लिखता था। लेकिन अब भैय्या के कहने को उल्टा करते हुए विचार लिख देता हूं
मेरा विचार व्यक्तिगत भी नहीं है। आईएएस अफसर बाबूलाल अग्रवाल के परिवार में पड़े आयकर के छापे के बाद यह पूरी तरह स्पष्ट हो चुका है कि अमीर धरती गरीब लोग यह सिर्फ शीर्षक ही नहीं वास्तव में यह छत्तीसगढ़ का चेहेरा है। आयकर विभाग ने भले ही रातो रात यह स्पष्ट कर दिया है कि छापा किसी अफसर के बंगले में नहीं बल्कि अफसर के परिवार के व्यापरिक प्रतिष्ठानो में हो रहे आयकर की चोरी के कारण पड़ा है। लेकिन छापा गरीब धरती के उन अमीरो के यहां पड़ा है। जिनके परिवार का एक सदस्य छत्तीसगढ़ के प्रशासनिक अमले में एक महत्वपूर्ण पद पर काबिज है। पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने पिछले महीने विधानसभा में कहा था कि छत्तीसगढ़ से नक्सलवाद खत्म तो हो जाएगा लेकिन अगर समस्याओ की जड़ में नहीं पहुंचा गया तो कोई और वाद पैदा हो जाएगा। यह सही बात है कि आज भी छत्तीसगढ़िया दो वक्त के रोटी के लिए खून पसीना एक करने के बाद भी पूरे परिवार के लिए रोटी कपड़ा मकान की व्यवस्था नहीं कर पा रहा है। जानवर से भी बदतर जीवन जीने वालो के हक को मारकर अपनी तिजोरी भरने वाले अफसर और व्यापारी यहां के भोले भाले और शांति से जीने वाले लोगो को सशस्त्र क्रांति के लिए मजबूर कर रहे है। भगवान किष्ण ने गीता में कहा है कि चोरी तब होती है जब एक आदमी के पास जरुरत से कम हो और एक आदमी के पास जरुरत से ज्यादा हो और शायद इस बैलेंस को बरकार नहीं रखा गया तो नक्सलवाद और न जाने कौन कौन से वाद पैदा होने लगगे। हालांकि आईएएस अफसर ने भी प्रदेश के नंबर वन अखबारो में अपना पक्ष रखते हुए आयकर छापे को अपने खिलाफ षडयंत्र करार दिया है। बहारहाल परिवार तो उनका ही है। और यह बात कौन पचाया गया। स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि जैसे विभाग के महत्वपूर्ण पदो में रहने वाले अफसर से क्या उम्मीद की जाए।

Wednesday, February 3, 2010

हथियार लाओ पैसे ले जाओ

रायपुर। नक्सल प्रभावित बस्तर में चल रहे आपरेशन ग्रीन हंट से नक्सलियों में बौखलाहट पैदा गया है। पुलिस ने इसका फायदा उठाते हुए सरेंडर पैंकेज का फार्मूला नक्सलियों के सामने रख दिया है। इससे बहुत जल्द ही बड़ी संख्या में नक्सलियों के आत्मसर्मपण करने की संभावना है। हथियार के साथ आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों को बीस हजार रुपए से लेकर तीन लाख तक की राशि दी जाएगी। नक्सलियों को मुख्यधारा में लौटाने के लिए केन्द्र और राज्य सरकार ने लुभावाने पैकेज बनाए थे। 2005 में 1378 नक्सलियों ने आत्मसर्मपण किया था। पिछले साल 2008-09 में 13 नक्सलियों ने आत्मसर्मपण किया है, लेकिन नक्सली फौज में शामिल ग्रामीण भयवश इस पैकेज को नकारते रहे हैं। आत्मसर्मपण करने वालों को नक्सली अपनी हिट लिस्ट में रखते हैं। इसके कई उदाहरण हैं। पिछले नौ सालों में नक्सलियों द्वारा मारे जाने वाले ग्रामीणों में लगभग सौ ऐसे सदस्य भी शामिल हैं। उन्होंने नक्सलियों का साथ छोड़ा था। सूत्रों के मुताबिक बस्तर के नक्सली कमांडर केन्द्री अर्धसैनिक बलों के पहुंचते ही वहां से निकल चुके हैं। स्थानीय नक्सली लड़ाके मोर्चा संभाले हुए हैं। नक्सली कमांडरों को यह उम्मीद है कि किसी तरह उनके समर्थक केन्द्र और राज्य पुलिस द्वारा चलाए जाने वाले ज्वाइंट आपरेशन को रोक पाने में सफल होंगे, लेकिन केन्द्र की मदद से तीन राज्यों में ज्वाइंट आपरेशन शुरू हो गया है, लिहाजा नामी नक्सली कमांडर भूमिगत हो चुके हैं। अधिकारिक सूत्रों के मुताबिक केन्द्रीय खुफिया विभाग के पास अब भी बहुत से नक्सली कमांडरों की तस्वीर नहीं है। जबकि आतंकी मामले में खुफिया विभाग के पास ईनामी आतंकियों के तस्वीर और स्केच मौजूद हैं। यही कारण है कि ईनामी नक्सलियों के पुलिसिया इश्तहार नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में चिपकाए तो जाते हैं, लेकिन ईनाम की रकम के साथ उनकी तस्वीर नहीं लगी होती है।

Friday, January 8, 2010

नक्सली आतंक से गरियाबंद, मैनपुर बंद

जिले के देवभोग से लेकर गरियाबंद तक के इलाके में नक्सलियों ने अपना झंडा लहराते हुए 28 दिसंबर को बंद का ऐलान किया था। इसका असर इलाके के छोटे मोटे बाजारों में स्पष्ट दिखा। मुख्यालय से भेजे गए फोर्स की मौजूदगी का स्थानीय व्यापारियों में जरा भी असर नहीं दिखा, बल्कि नक्सली दहशत में स्वस्फूर्त बंद रहा। नक्सलियों के फरमान को देखते हुए राजधानी से छूटने वाली गरियाबंद, देवभोग जाने वाली बसों के पहिए जहां थम गए थे, वहीं इस सड़क में पूरी तरह वीरानी छाई रही। डीजीपी विश्वरंजन ने गरियाबंद, मैनपुर इलाके में फोर्स भेजे जाने का जहां हवाला दिया था, वहीं नक्सलियों के पर्चे और पोस्टर मैनपुर में उनके दुस्साहस की गाथा कहने से बाज नहीं आ रही थी। मैनपुर में नक्सलियों ने अपनी ताकत दिखाई है। भूतेश्वरनाथ मंदिर गरियाबंद से लगे एक दर्जन गांव वर्दीधारी नक्सलियों के चंगुल में हैं। कुछ गांवों में नक्सलियों की आमद को देखते हुए दहशतभरी चुप्पी छाई हुई है। सूत्रों के मुताबिक जूनाडीह, खुर्सीपार, काजनसरा, बेन्कुरा जैसे गांवों के आसपास जंगलों में नक्सलियों की हथियार बंद टुकड़ियों की झलक ग्रामीणों तक पहुंच रही है। नक्सली जहां भय दिखाकर स्थानीय ग्रामीणों से मदद ले रहे हैं, वहीं गांवों में माओवाद की पाठशाला भी लगा रहे हैं। गरियाबंद के घने जंगल वाले अधिकांश ग्रामों में नक्सलियों ने पंचायत स्तर पर बैठके ली हैं। यहां की स्थिति 1986 -87 के बस्तर जैसी बनती जा रही है। अभी नक्सली ग्रामीणों का ब्रेन वाश करने में पूरी तरह सफल नहीं हो पाए हैं, लेकिन इस क्षेत्र में उनकी आमद ने ग्रामीणों को उनका साथ देने के लिए मजबूर कर दिया है।
सौ किमी तक छाया रहा दहशत नक्सली बंद में गरियाबंद से लेकर देवभोग तक लगभग 100 किलोमीटर तक की सड़कें नक्सली आतंक में सूनी थी। रोजाना इन सड़कों पर दौड़ने वाली बस, जीप, ट्रक के पहिए राजिम के आसपास ही थम गए थे।नक्सलियों का गश्त पुलिस भले ही इन इलाकों में नक्सलियों की संख्या कम आंकती हो, लेकिन सिहावा, नगरी, गरियाबंद, मैनपुर, देवभोग के जंगलों में नक्सलियों की कई हथियारबंद टुकड़ियों को पेड़ों की ओट लिए गश्त करते देखा जा सकता है। वन विभाग के अधिकारी-कर्मचारी भी इनके दहशत में अपने दफ्तरों से बाहर नहीं निकल रहे हैं। बाक्स जल्द चलेगा आपरेशन: कंवर गृहमंत्री ननकीराम कंवर ने कहा कि नए प्रभावित इलाकों का उन्होंने भी दौरा किया है। ग्रामीणों की दहशत से वे परचित हैं। इन क्षेत्रों में आपरेशन चलने वाला है।

विकास और आपरेशन एक साथ : विश्वरंजन

डीजीपी विश्वरंजन ने कहा कि इस वर्ष नक्सल प्रभावित राज्यों के मुकाबले छत्तीसगढ़ में कम नक्सली वारदात हुई हैं। यह आंकड़े केन्द्रीय गृह विभाग के हैं। बस्तर संभाग में अब आपरेशन और विकास एक साथ चलेगा। एक इलाके को सुरक्षा घेरे में लेकर पूरी तरह विकास किया जाएगा। यह आपरेशन उस समय तक चलेगा जब तक बस्तर पूरी तरह विकासित न हो जाए। हम ऐसी कोई समस्या वहां रहने नहीं देंगे जिससे नक्सलवाद और ऐसी कोई आतंकवादी संगठन वहां पनपने लगे। डीजीपी विश्वरंजन ने पुलिस मुख्यालय में नववर्ष मिलन समारोह में संवाददाताओं से चर्चा करते हुए कहा कि नक्सल प्रभावित बस्तर संभाग और राजनांदगांव में एक साथ आपरेशन शुरू होने वाला है। आपरेशन ग्रीन हंट के तहत नक्सलियों के ट्रेनिंग कैंपों में हमला बोला जाएगा और अर्धसैनिक बलों की कंपनी तैनात कर उस इलाके में विकास कार्य शुरू कराए जाएंगे। यह काम तब तक चलेगा जब तक वह इलाका पूरी तरह विकसित नहीं हो जाता। उसके बाद नए इलाके में विकास कार्य शुरू करेंगे। इस कार्य के लिए केन्द्र से फोर्स मिल चुकी है। आगे और भी फोर्स मांगी गई है। इससे हम अपने आपरेशन को अधिक से अधिक नक्सल प्रभावित इलाके में चला पाएंगे। उन्होंने कहा कि नक्सल प्रभावित इलाके में जाने से कोई अफसर नहीं कतराता। पहले भले ही हिचकता हो, लेकिन वहां जाने के बाद वह अपना काम शुरू कर देता है। थाने में तत्काल एफआईआर लिखे जाने के मामले में उन्होंने कहा कि सीआरपीसी में यह व्यवस्था पहले से ही है। उनके डीजी कार्यालय में भी एफआईआर लिखी जाती है। उन्होंने बताया कि छत्तीसगढ़ पूरी तरह नक्सली समस्या से मुक्त होने की लड़ाई में आगे है। छत्तीसगढ़ के मुकाबले दूसरे नक्सल प्रभावित राज्यों में नक्सली घटना में बढ़ोत्तरी हुई है। यह केन्द्रीय गृह विभाग की रपट है। उन्होंने कहा कि आपरेशन ग्रीन हंट और ज्वाइंट आपरेशन का विरोध करने से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है। आपरेशन को प्रभावित इलाकों में नागरिकों का समर्थन मिल रहा है। शहर में हैं नक्सलियों के ब्रेन डीजीपी विश्वरंजन ने कहा कि शुरू से ही शहरों में नक्सलियों का नेटवर्क काम कर रहा है। नक्सली शहर में नहीं बल्कि नक्सलवाद चलाने वाला ब्रेन शहर में रहता है। 2008 में पुलिस ने उसे ध्वस्त किया है। इस बिरादरी के लोग अब भी सक्रिय हैं, जिस पर पुलिस की पूरी नजर है। पश्चिम बंगाल में भी नक्सलियों का शहरी नेटवर्क कोलकाता में बैठता था। वह शहर में कभी अटैक नहीं करते। भर्ती न होने से बढ़ा नक्सलवाद 1990 से छत्तीसगढ़ में पुलिस भर्ती नहीं हुई थी, लिहाजा फोर्स धीरे धीरे कमजोर होता चला गया। पन्द्रह साल तक नई भर्ती नहीं होने के कारण नक्सली और अपराधी हावी होते चले गए। अब नई भर्ती से राज्य पुलिस को मजबूती मिली है। पहली पारी के भर्ती को नक्सल प्रभावित जिलों में भेजा गया है। अब नई भर्ती को मैदानी क्षेत्र में तैनात किया जाएगा। पुलिस में एक साथ भर्ती नहीं की जा सकती। जवानों को ट्रेनिंग के बाद ही मैदान में उतारा जाता है।

शहरी नक्सलियों को नहीं घेर पाई पुलिस

राज्य में नक्सली समर्थकों को घेरने के लिए 2005 में राज्य विशेष जनसुरक्षा अधिनियम बनाया गया था। पुलिस इस कानून के तहत चंद समर्थकों को ही आरोपी बना पाई है। इस कानून के तहत नक्सली समर्थकों को घेर पाने में पुलिस 2009 में पूरी तरह असफल रही है। राज्य पुलिस के सालाना रिपोर्ट के अनुसार राज्य विशेष जनसुरक्षा कानून के तहत सिर्फ सात प्रकरण दर्ज किए गए हैं। इसमें रायपुर, महासमुंद, धमतरी, कबीरधाम, बिलासपुर, रायगढ़, जांजगीर, कोरबा, सरगुजा, जशपुर, कोरिया, बलरामपुर, सुरजपुर, बस्तर, दंतेवाड़ा, बीजापुर, नारायणपुर में एक भी प्रकरण दर्ज नहीं कर पाई है। वहीं दुर्ग में राज्य विशेष जन सुरक्षा कानून के तहत एक प्रकरण दर्ज किया गया है। राजनांदगांव में पांच प्रकरण दर्ज हुए हैं। कांकेर में एक प्रकरण दर्ज हो पाया है। सूत्रों के मुताबिक पुलिस सही ढंग से शहरी और ग्रामीण नक्सली नेटवर्क को घेरने का प्रयास करती तो धमतरी, रायपुर, दुर्ग भिलाई, महासमुंद व कबीरधाम में लगभग आधा दर्जन से अधिक प्रकरण दर्ज कर सकती थी। सूत्रों के मुताबिक खुफिया विभाग ने लगभग एक दर्जन ऐसे व्यक्तियों के विषय में जानकारी एकत्र की थी। इन्हें इस कानून के तहत पुलिस घेर सकती थी। 2008 में राज्य विशेष जन सुरक्षा कानून के तहत शहरी नक्सली नेटवर्क से जुड़े आरोपियों को रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग भिलाई में गिरफ्तार किया गया था। दुर्ग में एक प्रकरण में पुलिस के चालान पेश नहीं कर पाने के कारण जहां गिरफ्तार आरोपी अजय टीजे को जमानत मिल गई, वहीं विवेचना फाइल भी बंद करनी पड़ी थी। धमतरी और राजनादगांव जिले में हुए नक्सली हमले के बाद नक्सलियों के साथ मिले स्थानीय ग्रामीणों को पुलिस इस कानून के तहत गिरफ्तार नहीं कर सकी। नक्सल प्रभावित बस्तर और सरगुजा रेंज में भी पुलिस इस कानून के तहत नक्सली समर्थकों को घेर पाने में नाकाम रही, वहीं 2007 और 2008 की गिरफ्तारी में पुलिस द्वारा की गई विवेचना पर न्यायलीन कार्रवाई में गवाही और साक्ष्यों के परीक्षण के दौरान उंगलियां उठनी शुरू हो गई है।

सलवा जुड़ुम कार्यकर्ताओं ने किया हमला

रायपुर। नर्मदा बचाओ आंदोलन की प्रमुख व प्रसिद्ध गांधीवादी नेता मेघा पाटकर ने कहा कि दंतेवाड़ा और पूरे बस्तर की स्थिति गंभीर है। सरकार और सलवा जूड़ूम कार्यकार्ताओं के इशारे पर गांधीवादी मानवाधिकार कार्यकर्ताओं पर हमला कर उन्हें वापस जाने के लिए बाध्य किया गया। मेघा पाटकर ने फोन पर हरिभूमि को बताया कि उनकी मांग है कि वनवासी चेतना आश्रम के संस्थापक हिमांशु कुमार और उसके कार्यकर्ताओं को यहां काम करने की छूट मिलनी चाहिए। उन्होंने कहा कि वनवासी चेतना आश्रम के कार्यकर्ता कोपा कुंजाम से मिलने वह जेल गई थीं। जहां जेल के अधिकारियों ने कहा कि वह उन लोगों से नहीं मिलना चाहता है, लेकिन मुलाकात करने के लिए अड़े रहने पर उन्होंने बाद में एक पत्र दिखाया जिसे कोपा कुंजाम ने लिखा गया बताया गया है। जिसमें उसने नहीं मिलने की इच्छा जताई है। उन्होंने कहा कि यह पत्र कोपा कुंजाम का नहीं था। वह पत्र कोपा कुंंजाम ने लिखा भी है तो वह पूरी तरह पुलिस के दबाव में है। मेघा पाटकर ने कहा कि उनके साथ और भी मानवाधिकार कार्यकर्ता है। इनके साथ वह बस्तर की हालत जानने आई हैं। उन्होंने कहा हम बस्तर के खनिज, वनसंपत्ति का दोहन करने वालों में से नहीं है, लेकिन ग्रामीणों को भड़काए जाने के कारण ऐसी स्थिति निर्मित हुई है। उन्होंने कहा कि केन्द्रीय गृह मंत्री पी चिंदम्बरम ने कहा था कि वह बस्तर में जनसुनवाई करेंगे। यह कार्यक्रम वनवासी चेतना आश्रम का नहीं था। केन्द्रीय गृह मंत्री पी चिदम्बरम द्वारा स्वंय से जारी किया गया बयान था। इसमें वह प्रभावित क्षेत्र में समस्या जानने के लिए जनसुनवाई कार्यक्रम में शामिल होना चाहती थी, लेकिन इस कार्यक्रम को राज्य सरकार ने होने नहीं दिया। उन्होंने कहा कि सलवा जूड़ूम शिविर में आदिवासी परिवार सुरक्षित नहीं है। हम यहां सभी प्रकार की हिंसा का विरोध कर रहे हैं। इससे सरकार को डरना नहीं चाहिए। फोर्स सीधे साधे ग्रामीणों को नक्सली बनाकर मार रही है या फिर गिरफ्तार कर रही है। इससे आदिवासी परिवार शिविरों में रहने के लिए मजबूर है।