Tuesday, March 16, 2010

बच्चे नक्सलियों से नहीं मीडिया से डर गए


नक्सल प्रभावित इलाके से आए बच्चे किसी न किसी पीड़ा से गुरुकुल आश्रम में रह रहे है। इस आश्रम का कार्य उस समय सही ढंग से शुरु हुआ जब तत्कालीन डीजीपी ओपी राठौर ने नक्सली हिंसा में पीड़ित और दहशत में डूबे अनाथ बच्चो को यहां रखवाने में मदद की थी। लगभग तीन साल बाद आश्रम में घटे घटना और स्टींग आपरेशन के बाद हुए विवाद में आश्रम के बच्चो में एक बार फिर चार साल पुराना खौफ छा गया। यह खौफ नक्सलियों का नहीं था। बल्कि उस मीडिया का था। जिनका कैमरा उनके आंसू कैद कर मार्मिक स्टोरी पेश कर उन्हें अपना हथियार बना रहा था। किसी को गिनती में बच्चे कम मिल रहे थे। किसी को भूखे लग रहे थे। किसी को भयभीत लग रहे थे। जबकि हकीकत यह है कि अपनी नौकरी बचने और खबरो की तलाश में भटके मीडिया कर्मी सच से कोसो दूर खड़े नजर आ रहे थे। बच्चो से बिना जाने दंतेवाड़ा में हंगामा हो गया। हिमांशु कुमार को भी चिंता हो गई। एक वरिष्ठ पत्रकार से रहा नहीं गया उन्होंने हिमांशु कुमार से बात कर बच्चे कम होने का बवाल भी खड़ा कर दिया। बच्चा पहले दिन से ही मिडिया को यह कम मिल रहे है। पहले दिन दो बच्चे गायब थे। बाद में समाज कल्याण विभाग ने सभी बच्चे होने की पुष्टि कर दी। एक बार मिडिया की खबर फिर झूठी हो गई। इसके चार दिन बाद दंतेवाड़ा कलेक्टर के आने पर नंबर वन अखबार के नंबर वन रिर्पोट को पता नहीं किसने कलेक्ट्रेर के हवाले से 16 में 15 बच्चे मिलने की सूचना दी। एक बच्चा कम होने का हल्ला मचा। 24 घंटे बाद कलेक्टर ने स्वंय अखबार के दफ्तर में फोन कर बताया कि एक भी बच्चा कम नहीं है। बच्चे भी अखबार की खबर और चैनल की रपट देखकर घबरा रहे है। पता नहीं कौन उनसे कैमरा टिकाकर क्या पूछेगा और कल क्या दिखाएगा और क्या बताएगा।