Thursday, December 29, 2011

anti crime report.................. bharat yogi


Saturday, December 3, 2011

14 अनाथ लापता तो एक नाबालिग गर्भवती, डॉ. यामिनी आबदे ने लगाए गंभीर आरोप

पुणे (आईएमएनबी) | कामशेत में स्थित विद्यावती आश्रम में एक 13 वर्षीय लड़की का बलत्कार 12 वर्षीय लड़के ने किया था | इस घटना पर जांच करने के लिए 5 सद्स्य नियुक्त किये गए जिस में से एक मानव अधिकार कार्यकर्ता डॉ. यामिनी आबदे ने जांच में कुछ गंभीर बाते सामने आते ही असंतोष पत्र जिला महिला और बाल कल्याण अधिकारी सुवर्ण पवार को भेज दिया | उस के दुसरे ही दिन सुवर्ण पवार ने डॉ यामिनी को बुलाकर कह दिया की आप यह विवरण जानकारी किसी को बहार ना दे |

डॉ यामिनी ने कहा, बात यहाँ जाकर खत्म नहीं होती है। इस के बावजूद में खोज बीन में लगी रही। इस मामले में तो मुझे धमकी भरे फ़ोन आ रहे थे | सुवर्ण पवार ने कुछ राजनेताओं के द्वारा मुझे धमकाने की कोशिश भी की, पर मैंने तुरंत देहु रोड पुलिस ठाणे में शिकायत दर्ज कर दी है | इसके बाद जब मैंने सुवर्ण पवार से पूछा के 14 बच्चे औषधालय से गायब है और 2003 -4 साल का प्रवेश रजिस्टर भी अभी नया क्यों बनाया है | तो सुवर्ण पवार ने मुझे यह कह कर धमकाया है। कि इस मामले में आप को कोई अधिकार नहीं है और आप इससे दुर रहे |
जब मीडिया ने सुवर्ण पवार से जवाब माँगा तो उनका कहना है कि आप फर्जी रिपोर्ट पर न जाए | हम जांच कर रहे है। लड़के का डीएनए और बच्चे का डीएनए हम जांच कर के उचित कारवाही करेंगे | परंतु इसके लिए और 4 महीने इंतजार करना पड़ेगा ।
दूसरी ओर इस मामले में डॉ यामिनी आदाबे कहना है की डीएन की आड़ में जांच को प्रभावित किया जा रहा है। तब तक मामले को पूरी तरीके से लड़की पर दवाब लाकर दबा दिया जाये गा यह डॉ. यामिनी का कहना है | सुवर्ण पवार को वडगाँव मावल के पुलिस थाने में बुला कर सफाई मांगी गई, की इस साल अगस्त में आप कई आश्रम निरीक्षण के लिए गए तो केवल दो आश्रम के रजिस्टार पर ही आप के हस्ताक्षर क्यों पाए गए। पवार ने अपने जवाब में यह कहा के वे जल्दबाजी में थी तो रह गया आश्रम के संचालक राजेश गुप्ता को भी पुलिस ने पुछताछ के लिए बुलवाया है |

महिलाओं और बाल कल्याण राज्य अधिकारी, वर्षा गायकवाड़ से इस घटना पर राय पूछा तो वे उनका कहना था कि हम महिलाओं और बच्चों के कल्याण आयुक्त उचित कार्रवाई करते हिए गहन जांच के बाद अपराधी के खिलाफ सख्त कदम उठाये जाएंगे | महिला बाल कल्याण विभाग पुणे के आयुक्त निगरानी और मार्गदर्शन में जांच किया जा रहा है। जांच पूरी तरह निष्पक्ष होगा। . "
डॉ. यामिनी आबदे ने आश्रम के वयस्थापन पर गंभीर आशंकाए जताते हुए आरोप लगाया है कि आश्रम के १४ बच्चे गायब है | मुझे पूरा यकींन है और कुछ जांच में सामने आया है की इन बच्चों के साथ ठीक नहीं हो रहा है |

यामिनी का आरोप बेबुनियाद, सुवर्ण
जिला महिला एवं बाल कल्याण विभाग की अधिकारी सुवर्ण पवार पर लगाए गए आरोप के मामले में जब आईएमएनबी संवादाता ने जवाब माँगा तो उनका कहना है कि आप फर्जी रिपोर्ट पर न जाए | मानव अधिकार कार्यकर्ता डॉ यामिनी का आरोप बेबुनियाद है। हम जांच कर रहे हैं। लड़के का डीएनए और बच्चे का डीएनए टेस्ट करवा कर हम जांच कर उचित कारवाही करेंगे | परंतु इसके लिए और 4 महीने इंतजार करना

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Tuesday, August 16, 2011

आजादी के 64 साल बाद चली गांधीवादी आंधी ,,,,,,,, आजादी के 64 साल बाद चली गांधीवादी आंधी


आजादी के 64 साल बाद चली गांधीवादी आंधी

आजादी के 64 साल बाद चली गांधीवादी आंधी


आजादी के 64 साल बाद एक बार फिर गांधीवादी आंधी अन्ना के रूप में चली है। केन्द्र सरकार ने अपने दमन नीति के तहत अन्ना के खिलाफ भी बयानबाजी और घपले के आरोपो का पिटारा खोल दिया है। लेकिन जनता सरकारी लोकपाल बिल के खिलाफ अन्ना के समर्थन में खड़े हो गई है। देश के सभी राज्यों में आम जनता और समाजिक संगठनों को अन्ना के समर्थन में सड़क पर उतरते देखा जा सकता है। रामलीला मैदान में बाबा रामदेव के साथ सरकारी हंथकंड़े और पुलिसिया आतंक को देखने के बाद भी वहीं जनता एक बार फिर सरकार के आतंक को ठेगा दिखाते हुए आजादी की दूसरी लड़ाई में शामिल है। हम कुछ देर के लिए मान भी ले कि अन्ना हजारे पर सरकार के द्वारा लगाए जा रहे आरोप सही भी है। लेकिन इसका यह मतलब नहीं की देश में सरकारी लोकपाल बिल का विरोध भी न हो। अन्ना हजारे के जीवन शैली को देखते हुए उन पर आरोप लगाना भी न्याया संगत नहीं है। अगर केन्द्र सरकार को लगता है कि अन्ना ईमानदार नहीं है तो एकाद ईमानदार व्यकि्त का नाम बताए जिनके नेतृत्व में जनता सरकारी लोकपाल बिल और कालेधन को भारत में वापस लाने का आंदोलन चला सके। सरकार पर भरोसा कर देश की जनता चुपचाप हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठ सकती है। सही मायने में किसी भी सरकार नाम की चीज पर भरोसा नहीं किया जा सकता है। लेकिन अन्ना हजारे जैसे निस्वार्थ देश हित में आंदोलन करने वालो के पीछे आंख बंद करके भी चला जा सकता है। समय की मांग है कि देश में भ्रष्टाचार खत्म होना चाहिए। छत्तीसगढ़ प्रदेश में अन्ना हजारे के आंदोलन को राजधानी रायपुर सहित पड़ोसी जिले के साथ ही नक्सल प्रभावित बस्तर में व्यापक समर्थन मिल रहा है। नक्सल प्रभावित देश के सात राज्यों में छत्तीसगढ़,झारखंड,उड़ीसा,बिहार,महाराष्ट्र,आंध्रप्रदेश मध्यप्रदेश में नक्सलवाद बढ़ने के पीछे भ्रष्टाचार और भ्रष्ट व्यवस्था ही एक बहुत बड़ा कारण है। जिसे झुठलाया नहीं जा सकता है। आज अगर नक्सली भी अपने रास्ते से भटके हैं और लेवी वसूलकर अपने करोड़ो के कारोबार को संचालित कर रहे हैं तो इसी भ्रष्ट व्यवस्था के चलते ही उन्हें ठेकेदारो और उद्योगपतियों से लेवी वसूलकर आदिवासियों का हक मारने का मौका मिल रहा है। बहरहाल भ्रष्टाचार से पीडित देश की जनता इसके खिलाफ जंग छेड़ चुकी है। गांधी वादी तौर तरीको से निपटने के लिए सरकार ने भी अपना फंडा तैयार कर लिया है। एक कांग्रेस शासित राज्य के पुलिस अधिकानी ने बताया कि सड़क पर उतरने वाले जनता पर चक्काजाम का मामला दर्ज होते ही गांधीगिरी निकल जाएगी। वहीं एक अफसर ने कहा बिजली गुलकरके एक साथ जनता कर्फयू लगाने वाले लोगो के बारे में भी खुफिया तंत्र पता लगा रहा है। अगर बिजली गुल करके अंधेरा किया और कोई घटना घटी चोरी ,लूट हत्या तो उस आंदोलनकारी की खैर नहीं है। कुल मिलाकर सरकारी तंत्र ने गांधीवादी तौर तरीको को कुचलने की तैयारी कर ली है।

Monday, August 8, 2011

होटल सिटीजन,महिला के हत्यारे का स्केच जारी किया



रायपुर। (आईएमएनबी) गंज इलाके के होटल सिटीजन में 7 अगस्त को मिली महिला की लाश की शिनाख्ती अभी नहीं हो पाई है। उड़ीसा पुलिस ने एक युवती के गुमशुदी की जानकारी देते हुए मृतिका की शिनाख्त के लिए परिजनो को रायपुर भेजा है। वहीं होटल में महिला के साथ पति के रूप में ठहराने वाले आरोपी का क्राइम ब्रांच ने सीआईडी की मदद से स्केच तैयार कर लिया है। जिससे उसकी पहचान तय मानी जा रही है।

Sunday, July 31, 2011

गृह मंत्री कवर और नए डीजीपी के बीच तालमेल

मुंबई आतंकी दहशत में नकाम सरकार और 2,500 से अधिक मौत





मुंबई (आईएमएनबी) पिछले एक दशक से अब तक कई गुना हमला किया गया है. अब तो मीडिया और राजनेताओं का कहानियों और बयानों को अच्छी तरह सेअभ्यास हो गया है. हाल ही में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और यूपीए अध्यक्ष सोनिया गाँधी 'नाम मात्र के लिए' प्ररंपरागत दौरा किया, मगर किसी ने भी
मनमोहन सिंह को याद नहीं दिलाया के उन्होंने मुंबई की शंघाई बनाने का वादा किया था. विस्फोट होते ही समाचार टीवी चैनलो में कई सारे प्रोग्राम आने लगते है. जहा दुनिया भरके पत्रकार और विशेषज्ञ विस्फोट कैसे हुआ, क्यों हुआ कौन दोषी ये बात पर चर्चा छेड़ देते हैं। किन्तु जहां पूरी सरकार ही भ्रष्ट है और नाकामयाब खुफिया तंत्र , कमजोर पुलिस बल के रहते भारत को आतंकवाद से कैसे छुटकारा मिलेगा.

मुंबई महानगर जिसे माया नगरी भी कहते हैं। इस सपनों के शहर में पिछले एक दशक से अब तक के विस्फोट में 2,500 से अधिक लोग मारे गए हैं.
1989 : एक टिफिन बॉक्स में पोटेशियम क्लोराइड और चीनी भरकर सेवरी रेलवे स्टेशन पर भेज दिया. जहां दो लोगो की मौते हो गई. हमलावरों ने विस्फोट करने के लिए ट्रिगर डिवाइस में सल्फ्यूरिक एसिड का इस्तेमाल किया था.
और दो विस्फोट मध्य रेलवे लाइन पर चलने वाली कुर्ला रेलवे और कन्जुर्मर्ग रेलवे स्टेशन पर किये गए. यहाँ भी पोटेशियम चोल्रिदे और सल्फ्यूरिक एसिड इस्तेमाल किया था.
1991: एक विस्फोट घाटकोपर बेस्ट बस स्थानक पर किया गया. जहा एक बस कंडक्टर सहित दो लोग विस्फोट में मारे गए थे.
दूसरा विस्फोट मध्य रेलवे लाइन पर चलने वाली लोकल ट्रेन में किया गया, जी में 4 लोग गंभीर रूप से घायल हो गए थे.
1993: 12 मार्च, 257 लोग मारे गए और 700 खंबीर रूप से घायल थे. सबसे ज्यादा विस्पोट से हताहत इसी साल होगी थी.12 बम पुरे मुंबई शहर भर इस तरह लगादिये के वो एक के बाद एक तुरंत विस्पोट हो रहे थे. भारत सरकार, और इन्टेलीजेंस, मुंबई पुलिस बल के लिए अब तक की सब से बड़ी शरमशार करने वाली घटना. हैं। जहां आतंकवादियो ने अपने खूब मनसूबे कामयाब किये. यहाँ हमला बाबरी विध्वंस के प्रतिशोध में किया गया था ऐसा मना जाता है.
1997: कम तीव्रता बम दक्षिण मुंबई में जामा मस्जिद के पास लगाया गया, यहा 3 लोग घायल हो गए थे.
1998: मलाड में एक कच्चे बम विस्फोट में एक आदमी की मौत.
दूसरा विस्फोट पश्चिम रेलवे लाइन पर चलने वाली लोकल ट्रेन में हुआ जिस में 9 लोगो की मौत
हुई थी. इस विस्पोट में आर डिअक्स का इस्तेमाल किया गया था.
2002: 6 दिसम्बर, फिर एक बार घाटकोपर स्टेशन के पास एक बेस्ट बस में विस्फोट हुआ, जिसमें दो लोग
मारे गए और २८ घायल हुए थे. अयोध्या के बाबरी मस्जिद के विध्वंस की दसवीं सालगिरह पर हुई थी ये बमबारी.
दूसरा विस्पोट सेंट्रल रेलवे स्टेशन पर एक मैकडॉनल्ड्स आउटलेट में, 25 से अधिक लोग घायल हो
गए हुवे थे. कम तीव्रता का गन पाउडर से बनाया गया था बम.
2003: 27 जनवरी, एक चक्र बम विले पार्ले में चलाया गया एक व्यक्ति की मौत हो गई और 27 लोग घायल हुए थे. यह हमला भारत के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की मुंबई यात्रा के दौरान एक दिन पहेले हुआ था.
13 मार्च, मुलुंड स्टेशन के निकट एक ट्रेन के डिब्बे में एक बम विस्फोट, 10 लोग मारे गए और 70 घायल हुवे थे. ये हमला 1993 के मुंबई बम विस्फोट की दसवीं सालगिरह के एक दिन बाद हुआ था.
28 जुलाई, घाटकोपर में तीसरी बार विस्फोट . बेस्ट की बस में एक बम 4 लोग मारा गया और 32 घायल हुवा था.
25 अगस्त, दो विस्फोट एक गेटवे ऑफ़ इंडिया में और दूसरा जवेरी बाज़ार. 50 लोगो की मरे गए और 145 घायल हुवे थे.
2006: 11 जुलाई, सात आय.ए.डि (इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस) पश्चिम रेलवे लाइन के प्रथम श्रेणी के डिब्बे ट्रेन में लगा दिए गए. इस विस्फोट में 209 लोगों की मौत और 800 से अधिक घायल हो गए थे जिसमें में 22 विदेशी सैलानी भी थे. मुंबई पुलिस के अनुसार, बम विस्फोट लश्कर - ए - तैयबा और इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी ) के छात्रों के द्वारा किए गए थे.
2008: 26 नवम्बर - 29 नवम्बर, तीन बड़े विस्पोट और लगाधर 3 दिन तक गोलीबारी, हैण्ड ग्रनैत की बमबारी से आतंकवादी हमला मुंबई में चल रहा था. 10 आतंकवादी के सहित 164 लोगो की मौत और ३०८ घायल. यह हमला दक्षिण मुंबई छत्रपति शिवाजी तेर्मिनुस, ओबेरॉय ट्रिडेंट, ताज महल पलके और तोवेर , लेओपोल्ड कैफे, काम हॉस्पिटल और नरीमन हाउस पर हवा था.
2011: 13 मार्च, तीन विस्फोट निशाने पर रहे ओपेरा हाउस , जावेरी बाजारी और दादर. कुछ ही मिनटों में एक के बाद एक विस्पोट, 21 लोगो मारे गए और 141 खंबीर घायल.

ये था अब तक का मुंबई आतंकी हम्लोका का कालक्रम. जैसे ही कोई आतंकी हमला होत है, सब से पहेले सत्ताधारी पार्टी अपना पला झाड़ते नज़र आती है। यहां तक के एक दुसरे के इस्तीफे की मांग करते है. भारतीय खुफिया तंत्र हमेशा खबरदार करती और भारत सरकार को सर्तक करते नज़र आई फिर भी कोई भी हमला रोका नहीं गया. सरकार और सरकार की सुरक्षा व्यवस्था इतनी भ्रष्ट होती नज़र आई है । कि अब भारतीय इन्टेलींजेस की रिर्पोट पर भी भरोसा नहीं किया जा सकता.

एक त्वरित परीक्षण और पारदर्शक न्याय और न्याय वेवासथा की भारत को अत्यनत जरुरत है, यही सारे भारतीयों कई मांग है. भारत एक मजबूत राष्ट्र और एक निवारक के रूप में तभी कार्यरत होगा. कसाब, अफजल जैसे अनेक आतंकी पर करोड़ो खर्च किये जा रहे है , जो सामान्य इंसान के टैक्स से होत है. जिस तरीके से अपील और केस चल रहे है, आतंकवादी यो का बुधपा यही आराम से गुजरेगा और एक सामान्य मौत मिलेगी. एक समय था जब भारत पीओके रेक्लैमिंग के बारे में बात करते थे. अब नाममात्र के लिए भी सूना नहीं जता सरकार से. कश्मीर के मामलों में यूपीए सरकार राजनीतिक, भौगोलिक और नैतिक ऊपरी हाथ घटता नज़र अता है.

आज तक जितने बेगुनाह मारे गये और उन्हें बचते पुलिस और , सेना के जवान जो शहीद हुए है. उनको न्याय मिलना मुश्किल नज़र अता है. प्रधानमंत्री या सरकार से कोई उम्मीद नहीं रही. आज की राजनीति आम इंसान के हित के लिए नहीं रही , राजनेताओं के सीट हतियाने के लिए रह गई है. अगर कुछ हो पाया तो लोक पाल बिल और 2014 में मतदान की जरिये कबिल नेताओं को वोट देकर एक अच्छी सरकार की उम्मीद की जा सकती है।

Wednesday, July 27, 2011

रेलवे प्लेटफार्म में लावरिस बच्चो को अपराध के दलदल से बचाने सिधुं ताई का अभियान

पुणे,मुंबई में अपराध कम करने के लिए महाराष्ट्र पुलिस ने काफी प्रयास किया और विभिन्न समाजिक संस्थाओं के साथ मिलकर अभियान भी चलाए लेकिन एक अभिय़ान महाराष्ट्र पुलिस के बिना मदद पूणे के प्लेटफार्म में एक एसा ही अभियान सिंधु ताई ने चलाया है। सिधुं ताई यह वह महिला है जो वर्षो पहले पुणे के प्लेटफार्म में भीख मांगा करती थी। उसने अपने आंखो से देखा था लावरिस बच्चो को होश संभालते ही यात्रियों के जूठन खाते और फेके हुए कचरे से खाने पीने की चीज ढूंढते हलांकि वह भी उनके बीच एक हिस्से के रूप में मौजूद थी। देश का कहो या फिर विदेश में ही क्यो ना हो रेल्वे प्लेटफार्म आवारा और लावरिस बच्चो की जन्म स्थली या कर्म स्थली के रूपमें पहचानी जाती है। लेकिन अब इन प्लेटफार्म से आवार और लावरिस बच्चो को असामजिक होने से बचाने के लिए और अपराध के दलदल में जाने से रोकने के लिए एक अभियान सिधुं ताई चल रही है। प्लेटफार्म के अधिकांश बच्चे अब सिंधु ताई के चार आश्रमों में अपराधिक जिंदंगी से छुटकारा पाकर समाजिक जिंदगी जी रहे हैं।

अब तक २७२ पुरस्कार से सम्मानित और भिक्षा व दान से मिले हुए पैसों से अनाथो के लिए पुणे सहित अमरावती महाराष्ट्र में चार आश्रमों का संचालन करने वाली ये वृद्ध महिला को देश और समाज सिंधु ताई के नाम से जानता है। पहले वो पुणे के रेलवे स्टेशन में भिक्षा मांगा करती थी, अब वो अपने आश्रम के बच्चों और वृद्धों के लिए भिक्षा मागंती है. सिंधुताई अनाथो की माई हजारो से भी ऊपर जिसके तरुण और वृद्ध बच्चे है.,सिधुं ताई पर आनंद नारायण महादेवन के निदेशन बनी मराठी फिल्म मी सिंधुताई सपकाल"मी सिंधुताई से आईएमएनबी संवाददाता नीलम बी से हुए बातचीत के अंश उनकी जुबानी उन्हीं
कहानी प्रस्तुत हैं।

अनाथो की माई' आप को क्यो कहते है. ये नाम आप को कैसे मिला ?
माई : में खुद अनाथ थी, अब मेरा परिवार बहुत बड़ा है. अनाथ होने का दर्द और जीवन का संघर्ष बखूभी समझती हु, क्यों के ये सब मैंने अनुभव किया है." में अनाथ तू अनाथ, तेरा मेरा जम गया". मेरी जात अनाथ है,इस तरह दुसरे अनाथो के पास पहुंच गई और उनकी माई बन गई.

आपके जीवन का अब तक का ये सफ़र संक्षेप में बताये
माई : मेरे जीवन पर किताबे लिखी गई है, जो कर्नाटक के पाठशाला में पढ़ाए जाते है और (सिनेमा)फिल्म भी बन चूकी है. मेरी पूरी कहानी इस सिनेमा में दर्शाइ गई है. इस लिए में तमाम आईएमएनबी समाचार पड़ने वालो को दरखास करती हुं के आप ये सिनेमा 24 जुलाई, रविवार को झी मराठी पर जरुर देखिए.

ये जो अपने जीवन में संघर्ष का सामना आपने किया है अब तक ,इस अनुभव से आप आज की महिलाओं को क्या संदेश देना चाहेंगी
माई : " सीना तान के आगे बढो. ये भी कुछ कम नहीं तेरा दर छुटने के बाद, हम अपने पास आये दिल टूटने के बाद". अरे दिल टूटने के बाद पता चलता है, इसी का नाम जिदंगी है. " हाँ जब वो आये तो चेहरे पर रख रखाव था, मगर वो जो नहीं देख सके वह मेरे दिल का घाव था".अपना घाव अगर कोई नहीं समझ सकता तो उसका प्रदर्शन नहीं करना चाहिए. दूसरो का घाव और दर्द को समझने के लिए ही स्त्री का जन्म हुआ है. अगर वो अपने घाव को पचा कर दर्द को समझ सकती है,तो ही वो दूसरो के दर्द हल्का करके ख़ुशी दे सकती है.माई आपको दुसरो की पीड़ा देख कर बहुत दर्द होता है ?,आप किस तरह इस में ख़ुशी ढूंढ लेती है!माई : मेरा दर्द मैंने जी लिया. दुसरो का दर्द समझती हूँ, और बाटंती भी हूँ. जब पुणे रेलवे प्लेटफार्म पर आखरी ट्रेन निकलती, तो सारे लोग अपने अपने घर जाने के लिए बोगी पकड़ते और में लाचार की तरह उन्हें देखा करती. मुझे घर नहीं चाहिए था बस एक रात बिताने के लिए घर के कोने का असरा चाहिए था. क्यों के मुझे अकेले रहने का कोई दर्द नहीं था पर लोंगो से डर लगता था. मुझे किसी ने नहीं पुछा के तुम्हे कहा जाना है. तुम्हे घर नहीं तो चलो हमारे घर के कोने में रहलो. इस लिए में अभी भी रेलवे प्लेटफार्म पर जाती हु, किसी को मेरी जरुरत है क्या देखती हु. मुझे किसी ने नहीं कहा तो क्या, में अनाथो को अपने साथ ले आती हूँ और मेरे उस दर्द में इस तरह से ख़ुशी में ढूंढ लेती हुं." सच कहू तो मुझे अब खुशी से एलेर्जी हो गई है. दर्द मुझे प्यारा लगने लगा है".

माई से और भी बाते होती रहेगी. उनके और भी अनुभव हम जानेंगे दुसरे रु ब रु मुलाकत में और कुछ सिखने की कोशिश करेंगे. "मी सिंधुताई सपकाल" सिनेमा जरुर देखिए ये हर स्त्री के जीवन से जुडी ये कहानी है.

Monday, June 27, 2011

सिक्युरिटी फिल्ड अफसर के पद पर कार्यरत सुरेन्दऱ सिंह उर्फ सरोज सिंह (35 साल) निवासी बलिया उत्तर प्रदेश ,इंडस्ट्रीयल आर्मी सिक्युरिटी सविंस रवि भवन राय


सुरेन्दऱ सिंह उर्फ सरोज सिंह (35 साल) निवासी बलिया उत्तर प्रदेश ,इंडस्ट्रीयल आर्मी सिक्युरिटी सविंस रवि भवन रायपुर छत्तीसगढ़ में सिक्युरिटी फिल्ड अफसर के पद पर कार्यरत था। यहां से गबन करके फरार हुआ है। उसके हिसाब में कंपनी के लेने देने में पचास हजार के करीब की गड़बड़ी मिल रही है। उसके खिलाफ एक और मामले में गोलबाजार पुलिस ने धारा 354,341 के तहत अपराध कायम किया है। आमानाका थाना में भी उसके खिलाफ शिकयत दर्ज करवाई गई है। इसकी सूचना देने वाले को 1000 का ईनाम कंपनी नकद देगी इससे किसी भी प्रकार के लेनदेन के लिए कंपनी जिम्मदार नहीं होगी

Tuesday, June 14, 2011

Sunday, June 5, 2011

बाबा ने हनुमान की तरह कांग्रेस की लंका में आग लगा दिया है


मनमोहन सरकार के खिलाफ पूरे देश में आक्रोश है। कांग्रेसी भी सरकार के इस रव्वैया से भीतर ही भीतर खपा है। आखिर उन्हें भी आम जनता के बीच जाना पड़ेगा। क्या जवाब देगे।बाबा रामदेव को कारपेट जगत का एजेंट कह देना असान है। लेकिन रामलीला मैदान में आम जनता पर लाठी चाज का जवाब कांग्रेसियों के पास नहीं है। कांग्रेसी भी हट कर रहे हैं। अपनी गलती नहीं मानने के लिए लेकिन अन्दर ही अन्दर उनक हट योग कमजोर होता जा रहा है। बहरहाल मनमोहन सरकार पर विरोधी आपातकाल 1975 और जलियावाला बाग की संज्ञा दे रहे है। देखते ही देखते ही देश में भूचाल आ गया है। वरिष्ठ कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह ने बाबा के खिलाफ आग उगलना शुरू जारी रखा है। हलांकि इससे बाबा का सिफ प्रचार ही होने वाला है। कुल मिलाककर कांग्रेस को पूरे देश में अलग अलग भाषाओं की गालियां दी जा रही है। बाबा ढोगी और पांखडी थे तो सरकार अब तक क्या कर रही थी। मनमोहन सरकार को लग रहा था। की भारत स्वाभिमान मंच भाजश की काट है। भाजपा को नुकसान पहुंचाने के लिए यह मंच बढि़या काम कर रही है। लेकिन भारत स्वाभिमान मंच ने हनुमान की तरह कांग्रेस की लंका में आग लगा दिया है। जिससे भाजपा के लिए किले फतह करना आसान हो गया है। अब संघ और विहिप ने खुलकर राग अलपना शुरू कर दिया है। अगर यह साधु संत किसी और धरम का होता तो क्या कांग्रेस एसा करती है। कुल मिलाकर संघ परिवार और भाजपा ने पूरे मामले को केस कर लिया है। लंका पूरी तरह जल रही है। महिलाओं के कपड़े में भागे बाबा रामदेव साफ कह रहे है। मनमोहन सरकार उनका एनकाउंटर करवाना चाहती थी। अगर उन्हें कुछ हुआ तो सोनिया गांधी जिम्मेदार होगी। अब बाबा माया की शरण में जाना चाह रहे हैं। यह तो तय है बाबा सरकार का शीषर्सन करवाकर दम लेगें।

Friday, May 20, 2011

भ्रष्ट आधिकारियो ने उसे फसने का प्रयास करना छोड़ दिया ...जीत हुई जनता की ,,,,,,,,,,




पत्रकार होने के नाते मुझे इस घटना की जानकारी पहले ही हो गई थी। लेकिन मै शहर की तसीर नाप रहा था। दुसरे दिन ही मैं मानव अधिकार निगरानी समिति के पदाधिकारियों के साथ वहां न्यायालय पहुंचा। आधिवक्ता लीलाधर चंद्राकर से मिला। उन्हें पहले ही इसकी जानकारी दे चुका था। उन्होंने जमानत के लिए आवेदन लगाया। जमानतदार के रूप में घनश्याम चौधरी ने हलफनामा भरा। बिना जान पहचान के जमानत के दौरान हमे औपचाकिता पूरी करने में दिक्कत आई। लेकिन उस बुजग को बहार निकलना था। कैसे भी। देर शाम तक हम परेशान होते रहे। शाम को माननीय कायपालक दंडधिकारी ने भी रूचि दिखाई। जमानत दे दिया। शाम को मानव अधिकारी निगरानी समिति के लोग वहां पहुंच गए। बाहर निकलने पर सेवानिवृत सबइंजिनियर लोकेद्र सिहं भड़क गया। उसने कहा मुझे जेल में ही रहने दो। किसी तरह उन्हें समझाबुझाकर बाहर निकाला गया। उन्होंने अपने किसी रिश्तेदार के घर शांतिनगर में जाने की बात कहीं। दुसरे दिन उसने खुद फोन किया सुनीता जी को, मानव अधिकार निगरानी समिति के लोग कोषलाय पहुंचे। राजधानी की मिडिया ने पूरा सहयोग किया था। अखबार लोकेनदऱ के पक्ष में रंगे हुए थे. हरि भूमि,से ब्रम्हवीर जी का पत्रिका से अनुज सक्सेना का लगातार पूरे घटना को लेकर समथर्न रहा प्रेस क्लब अध्यक्ष अनिल पुसदकर,वाकिग जनलिस्ट के प्रदेशअध्यक्ष नारायण शमा सभी का फोन आ रहा था। सब का समथर्न था। ४.४२.१७०० का चेक मिला ..पिछले चार साल से अपने पेंशन के लिए भटक रहा था ,,९ मई को परेशान होकर उसने सब्जी काटने की छुरी से जिलाधीश परिसर में स्थित कोषालय के अधिकारी जे आर साहू पर हमला कर दिया था ,,धारा १५१ के तहत गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था ,,,१० मई को मानवाधिकार निगरानी समिति की प्रभारी सुनीता टिकरिया की पहल पर आधिवक्ता लीलाधर चंद्राकर ,पत्रकार भारत योगी ,घनश्याम चौधरी ,अमित सिंग ने लोकेंदर सिंग सेवान्रिवित सब इंजीनयर की जमानत करवाई ,,,११ मई को उसे उसका हक़ दिलवाया...इस पुरे मामले में सारे लोगो की हमदर्दी लोकेंदर सिंग के साथ थी ,,रायपुर की मिडिया ने पूरा सहयोग कर भ्रष्ट आधिकारियो की पोल खोली इस लिए भ्रष्ट आधिकारियो ने उसे फसने का प्रयास करना छोड़ दिया ...जीत हुई जनता की ,,,,,,,,,,

Friday, April 15, 2011

भिलाई की घटना के लिए प्रशासन और मीडिया जिम्मेदार


दुर्ग जिला प्रशासन,पुलिस, लोकल मिडिया इस मानवता को शर्मिंदा करने वाली घटना का जिम्मेदार है ..इससे मिलती जुलती घटना २००८ की है ,,,रायपुर तेलीबांधा में एक साहू परिवार भू माफिया के साजिश का शिकार हो गया ,,किसी रिश्तेदार द्वार जमींन मकान बेच देने पर सड़क पर आ गया था.उसने परिवार ने भी बंद कमरे में गैस सिलेंडर खोलकर अपनी जवान चार बहनों और माँ बाप के साथ आत्महत्या करने की धमकी दी थी,,,मै उस समय हरि भूमि का पत्रकार था ,मेरे साथ नई दुनिया का पत्रकार अनुज सक्सेना भी था ,,,,हम दोनों पुलिस से पहेले पहुच गए थे ,,,भू माफिया के गुंडे उस वक्त वहा मौजद थे ,,,हमारी मौजूदगी में तेलीबांध का थानेदार भी पहुच गया उसने भू माफिया की और से दलाली शुरू कर दी ,,,,,हमने मौके को भाप लिया मैंने ततकाल इसकी जानकारी एसएसपी बी एस मरावी ओउर सीएसपी शशि मोहन को दी इसके साथ ही शिव सेना सहित आधा दर्जन इसे सामाजिक सगठनों को दी ,,जो तत्काल घट्न स्थल में पहुचे और परिवार आपनी हकीकत बताने में कामयाब रहा ,,,भू माफिया के गुंडों पर सीएसपी शशि मोहन ने पहुचते डंडे बरसने शुरू कर दिए वाही थानेदार भी बदला हुआ नजर आया जिसने गुंडों को अचानक मरना शुरू कर दिया.हलाकि इस बीच मुझे भी प्रेस के एक सीनयर का फोन आना शुरू हो गया था ,,,जिसने कहा क्यों तमाशा करवा रहे हो ,,,,,जमीन भैय्या की है ,,एसएसपी बी एस मरावी सीएसपी शशी मोहन सिंग और रायपुर की मिडिया की वजह से साहू परिवार आत्महत्या करने से बच गया ,,,यहाँ की मीडिया ने साहू परिवार के दर्द को प्रमुखता से प्रकशित किया ,,,,,,,,यह बाते मायने किसी को महिमा मंडित करने और अपनी वह वाही करने के लिए नहीं लिख है ,,बल्कि प्रशासन और मीडिया की जिम्मेदारी क्या होती है यह बताई है ,,,खैर जो घटना हो गई उसके लिए अफ़सोस तो है ,,लेकिन भविष्य में प्रशासन और मीडिया इस तरह की घटना होने से रोके समाज में हमारी यही जिम्मेदारी है ,,,छत्तीसगढ़ की औद्योगिक नगरी भिलाई में दिल दहला देने वाली घटना हुई।

पिता की मृत्यु के बाद भिलाई स्टील प्लांट (बीएसपी) में अनुकंपा नियुक्ति की बाट जोह रहे परिवार को जब निराशा हाथ लगी तो बेरोजगार युवक की मां व तीन बहनों ने जहर सेवन कर आत्महत्या कर ली। यह घटना अचानक भी नहीं हुई, मौत से पहले पांच दिनों तक यह परिवार अपने आपको घर में बंधक बनाकर लगातार आत्महत्या कर लेने की धमकी दे रहे थे। बीएसपी प्रबंधन ने परिजनों से मिलकर नौकरी देने का आश्वासन भी दिया था लेकिन अधिकारी प्रबंधन का चक्कर लगाकर परेशान हो चुके परिवार को भरोसा दिलाने में नाकाम रहा तभी तो उन्होंने आत्महत्या करने जैसा कड़ा कदम उठाया!
दरअसल, कहानी की शुरूआत 3 दिसंबर 1994 से शुरू होती है जिस दिन सुनील गुप्ता के पिता की लाश रेलवे पटरी पर मिली थी। स्व. एमएल गुप्ता बीएसपी में कार्यरत थे। परिजन उनकी मौत को हत्या करार देते रहे जबकि भिलाई स्टील प्लांट प्रबंधन इसे आत्महत्या मानता आया। उस वक्त सुनील की उम्र 20 वर्ष थी, जब वे नौकरी के योग्य हुए तब से वे लगातार प्रबंधन से नौकरी की गुहार लगाते रहे। नाकाम होने पर उन्होंने इहलीला समाप्त करने का कठोर निर्णय लिया। पिता के मौत से शुरू हुई कहानी का अध्याय परिवार के शेष चार सदस्यों की मौत से समाप्त हो गया। अब केवल सुनील गुप्ता बच गया है। इस घटना से पूरा नगर स्तब्ध है। कई सवाल उठ रहे हैं, लेकिन जवाब नहीं मिलने के कारण लोगों में बीएसपी प्रबंधन व प्रशासन के खिलाफ आक्रोश है। जब पांच दिनों से अपने आपको बंधक बनाकर हाथ में सल्फॉस जैसे खतरनाक जहर की गोलियां रख आत्महत्या कर लेने की धमकी दे रहे थे तब जिला प्रशासन ने उन्हें अकेले छोड़ा क्यों? ऐसी बात नहीं है कि जनप्रतिनिधियों व प्रशासन के लोगों ने परिवार को समझाने की कोशिश नहीं की, लेकिन इतना बड़ा कदम उठाने के पीछे क्या कारण रहे, यह भी जांच का विषय है?
घटना के पीछे की मनोवृत्ति को भी समझने की जरूरत है। एक तो यह कि आज देश में बेरोजगारी बढ़ रही है। एक-तरफ नामी संस्थानों से पढ़कर निकलने वाले युवक-युवतियों को लाखाें रुपए का पैकेज मिल रहा है लेकिन मध्यम-लघु उद्योग -व्यापार करने वाले संस्थानों में वेतन आकर्षक नहीं है और काम बहुत है। यही वजह है कि उदारीकरण के बीस साल बाद भी युवाओं में सरकारी नौकरी के प्रति आकर्षण बरकरार है। शायद सरकारी नौकरियां अधिक सुरक्षा व सुविधाएं देती हैं। यह बात समझने की है कि ऐसा वातावरण तैयार करने की जरूरत है जिसमें हर युवा अपने भविष्य को लेकर निश्चिंत रहे। यह नहीं हो पा रहा है। यहां तक कि इंजीनियरिंग व मैनेजमेंट की डिग्री लेने के बाद भी मन मुताबिक रोजगार नहीं मिल पा रहा है। लेकिन देश में काम की कोई कमी है, ऐसी बात भी नहीं है। स्वरोजगार के जरिए लोग ठेला-खोमचा लगाकर परिवार चला लेते हैं फिर पढ़े-लिखे युवा अगर अपना खुद का व्यापार करे तो इसमें बुराई क्या है।
भिलाई में अनुकंपा नौकरी नहीं मिलने के कारण परिजनों द्वारा आत्महत्या कर लेने की घटना सावधान करने वाली है। प्रत्येक संस्थान में नौकरी व अनुकंपा नौकरी देने की अपनी व्यवस्था होती है। लेकिन मानवीय दृष्टिकोण से सभी प्रकरणों पर नियम का हवाला देकर एक समान बर्ताव भी नहीं किया जाना चाहिए। यह नहीं भूलना चाहिए कि सार्वजनिक उपक्रमों की स्थापना जनकल्याणकारी भावना के अनुरूप की गई थी। देश के युवाओं को रोजगार देना एक प्रमुख लक्ष्य था। यह भी गौर करने लायक है कि नियम से परे जाकर किसी एक को अनुकंपा नौकरी दे दी गई तो इससे प्रबंधन के लिए परेशानी हो सकती है। ऐसा लगता है कि सुनील गुप्ता के साथ प्रबंधन का रवैया अनुकंपा नौकरी देने को लेकर जो भी रहा हो लेकिन एक मानवीयता का अभाव जरूर था। इस बेरोजगार युवक को उनके पिता के सहयोगियों द्वारा सही सलाह दी जाती तो शायद वह किसी अन्य रोजगार-स्वरोजगार की ओर ध्यान देता। ऐसी घटनाएं किसी उपक्रम को लेकर समस्या नहीं है बल्कि समाज की कमजोरियों को भी उजागर करती है। सुनील गुप्ता का परिवार आर्थिक तंगी के दौर से नहीं गुजर रहा था, ऐसी जानकारी मिली है। नौकरी को लेकर परेशानी थी लेकिन किसी परेशानी का समाधान जान देकर तो की नहीं जा सकती। बहुत से ऐसे परिवार भी हैं जो बेहद प्रतिकूल परिस्थिति में जीते है, संघर्ष करते हैं और सफल भी होते हैं।
अब अगला अध्याय शुरू हो चुका है। कई ट्रेड अप्रेंटिस का प्रशिक्षण लिए युवक जिन्हें भिलाई स्टील प्लांट में नौकरी नहीं मिली है वे टंकी के ऊपर चढ़कर प्रबंधन पर नौकरी का दबाव बना रहे हैं। राजनीतिक पार्टियों के नेताओं के दौरे शुरू हो गए। बीएसपी प्रबंधन पर इसकी जवाबदारी तय की जा रही है। कुछ दिनो में यह प्रकरण भी अन्य प्रकरणों की तरह शांत हो जाएगा। होता यही है, मुद्दा कुछ समय तक ही चर्चा में रहता है। ऐसा होना नहीं चाहिए। देश में युवा को सही मार्गदर्शन की जरूरत है। इस बात पर चिंतन हो कि किसी परिवार का इस तरह मौत को गले लगाने की जरूरत नहीं पड़े।

Monday, April 4, 2011

हम किसी राज ठाकरे जैसे नेता की तलाश में नहीं

फिर से ब्लाग में लिखना शुरू कर रहू ,,,,,,छत्तीसगढ़ में शोषण बढता जा रहा है.हम किसी राज ठाकरे जैसे नेता की तलाश में नहीं है न ही छत्तीसगढ़ में हम कोई राज ठाकरे पैदा करना चाहते लेकिन गैर छत्तीसगढ़यो ने अपने दोहन परम्परा में सुधार नहीं किया तो बदती बेरोजगारी ,,,,,,,,,जल जंगल जमींन का दोहन ,,,,,,,,छत्तीसगढ़ में एक तूफान खड़ा कर सकता है ,,,,,,,,,,जिसका खामियाजा शोसको को भुगतना सकता है ,,,,,,,,,पुरे प्रदेश में जनता की हालत ख़राब है ,,,बस्तर सभांग नक्सली समस्या से जूझ रहा है ,,,,,,,,,,फ़ोर्स से भी जनता पीड़ित है ,,,,,,,,,,सरकार नक्सलवाद ख़त्म करने की सनक में जनता को ही न ख़तम कर दे ,,,नक्सलियों के सताए ग्रामीण अब फ़ोर्स का कहर झेल रहे है. ,,,ताड़मेंतला की घटना से कुछ ऐसा ही लग रहा है ,,,,,,,,,,,,

Tuesday, February 22, 2011