Friday, January 8, 2010

नक्सली आतंक से गरियाबंद, मैनपुर बंद

जिले के देवभोग से लेकर गरियाबंद तक के इलाके में नक्सलियों ने अपना झंडा लहराते हुए 28 दिसंबर को बंद का ऐलान किया था। इसका असर इलाके के छोटे मोटे बाजारों में स्पष्ट दिखा। मुख्यालय से भेजे गए फोर्स की मौजूदगी का स्थानीय व्यापारियों में जरा भी असर नहीं दिखा, बल्कि नक्सली दहशत में स्वस्फूर्त बंद रहा। नक्सलियों के फरमान को देखते हुए राजधानी से छूटने वाली गरियाबंद, देवभोग जाने वाली बसों के पहिए जहां थम गए थे, वहीं इस सड़क में पूरी तरह वीरानी छाई रही। डीजीपी विश्वरंजन ने गरियाबंद, मैनपुर इलाके में फोर्स भेजे जाने का जहां हवाला दिया था, वहीं नक्सलियों के पर्चे और पोस्टर मैनपुर में उनके दुस्साहस की गाथा कहने से बाज नहीं आ रही थी। मैनपुर में नक्सलियों ने अपनी ताकत दिखाई है। भूतेश्वरनाथ मंदिर गरियाबंद से लगे एक दर्जन गांव वर्दीधारी नक्सलियों के चंगुल में हैं। कुछ गांवों में नक्सलियों की आमद को देखते हुए दहशतभरी चुप्पी छाई हुई है। सूत्रों के मुताबिक जूनाडीह, खुर्सीपार, काजनसरा, बेन्कुरा जैसे गांवों के आसपास जंगलों में नक्सलियों की हथियार बंद टुकड़ियों की झलक ग्रामीणों तक पहुंच रही है। नक्सली जहां भय दिखाकर स्थानीय ग्रामीणों से मदद ले रहे हैं, वहीं गांवों में माओवाद की पाठशाला भी लगा रहे हैं। गरियाबंद के घने जंगल वाले अधिकांश ग्रामों में नक्सलियों ने पंचायत स्तर पर बैठके ली हैं। यहां की स्थिति 1986 -87 के बस्तर जैसी बनती जा रही है। अभी नक्सली ग्रामीणों का ब्रेन वाश करने में पूरी तरह सफल नहीं हो पाए हैं, लेकिन इस क्षेत्र में उनकी आमद ने ग्रामीणों को उनका साथ देने के लिए मजबूर कर दिया है।
सौ किमी तक छाया रहा दहशत नक्सली बंद में गरियाबंद से लेकर देवभोग तक लगभग 100 किलोमीटर तक की सड़कें नक्सली आतंक में सूनी थी। रोजाना इन सड़कों पर दौड़ने वाली बस, जीप, ट्रक के पहिए राजिम के आसपास ही थम गए थे।नक्सलियों का गश्त पुलिस भले ही इन इलाकों में नक्सलियों की संख्या कम आंकती हो, लेकिन सिहावा, नगरी, गरियाबंद, मैनपुर, देवभोग के जंगलों में नक्सलियों की कई हथियारबंद टुकड़ियों को पेड़ों की ओट लिए गश्त करते देखा जा सकता है। वन विभाग के अधिकारी-कर्मचारी भी इनके दहशत में अपने दफ्तरों से बाहर नहीं निकल रहे हैं। बाक्स जल्द चलेगा आपरेशन: कंवर गृहमंत्री ननकीराम कंवर ने कहा कि नए प्रभावित इलाकों का उन्होंने भी दौरा किया है। ग्रामीणों की दहशत से वे परचित हैं। इन क्षेत्रों में आपरेशन चलने वाला है।

विकास और आपरेशन एक साथ : विश्वरंजन

डीजीपी विश्वरंजन ने कहा कि इस वर्ष नक्सल प्रभावित राज्यों के मुकाबले छत्तीसगढ़ में कम नक्सली वारदात हुई हैं। यह आंकड़े केन्द्रीय गृह विभाग के हैं। बस्तर संभाग में अब आपरेशन और विकास एक साथ चलेगा। एक इलाके को सुरक्षा घेरे में लेकर पूरी तरह विकास किया जाएगा। यह आपरेशन उस समय तक चलेगा जब तक बस्तर पूरी तरह विकासित न हो जाए। हम ऐसी कोई समस्या वहां रहने नहीं देंगे जिससे नक्सलवाद और ऐसी कोई आतंकवादी संगठन वहां पनपने लगे। डीजीपी विश्वरंजन ने पुलिस मुख्यालय में नववर्ष मिलन समारोह में संवाददाताओं से चर्चा करते हुए कहा कि नक्सल प्रभावित बस्तर संभाग और राजनांदगांव में एक साथ आपरेशन शुरू होने वाला है। आपरेशन ग्रीन हंट के तहत नक्सलियों के ट्रेनिंग कैंपों में हमला बोला जाएगा और अर्धसैनिक बलों की कंपनी तैनात कर उस इलाके में विकास कार्य शुरू कराए जाएंगे। यह काम तब तक चलेगा जब तक वह इलाका पूरी तरह विकसित नहीं हो जाता। उसके बाद नए इलाके में विकास कार्य शुरू करेंगे। इस कार्य के लिए केन्द्र से फोर्स मिल चुकी है। आगे और भी फोर्स मांगी गई है। इससे हम अपने आपरेशन को अधिक से अधिक नक्सल प्रभावित इलाके में चला पाएंगे। उन्होंने कहा कि नक्सल प्रभावित इलाके में जाने से कोई अफसर नहीं कतराता। पहले भले ही हिचकता हो, लेकिन वहां जाने के बाद वह अपना काम शुरू कर देता है। थाने में तत्काल एफआईआर लिखे जाने के मामले में उन्होंने कहा कि सीआरपीसी में यह व्यवस्था पहले से ही है। उनके डीजी कार्यालय में भी एफआईआर लिखी जाती है। उन्होंने बताया कि छत्तीसगढ़ पूरी तरह नक्सली समस्या से मुक्त होने की लड़ाई में आगे है। छत्तीसगढ़ के मुकाबले दूसरे नक्सल प्रभावित राज्यों में नक्सली घटना में बढ़ोत्तरी हुई है। यह केन्द्रीय गृह विभाग की रपट है। उन्होंने कहा कि आपरेशन ग्रीन हंट और ज्वाइंट आपरेशन का विरोध करने से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है। आपरेशन को प्रभावित इलाकों में नागरिकों का समर्थन मिल रहा है। शहर में हैं नक्सलियों के ब्रेन डीजीपी विश्वरंजन ने कहा कि शुरू से ही शहरों में नक्सलियों का नेटवर्क काम कर रहा है। नक्सली शहर में नहीं बल्कि नक्सलवाद चलाने वाला ब्रेन शहर में रहता है। 2008 में पुलिस ने उसे ध्वस्त किया है। इस बिरादरी के लोग अब भी सक्रिय हैं, जिस पर पुलिस की पूरी नजर है। पश्चिम बंगाल में भी नक्सलियों का शहरी नेटवर्क कोलकाता में बैठता था। वह शहर में कभी अटैक नहीं करते। भर्ती न होने से बढ़ा नक्सलवाद 1990 से छत्तीसगढ़ में पुलिस भर्ती नहीं हुई थी, लिहाजा फोर्स धीरे धीरे कमजोर होता चला गया। पन्द्रह साल तक नई भर्ती नहीं होने के कारण नक्सली और अपराधी हावी होते चले गए। अब नई भर्ती से राज्य पुलिस को मजबूती मिली है। पहली पारी के भर्ती को नक्सल प्रभावित जिलों में भेजा गया है। अब नई भर्ती को मैदानी क्षेत्र में तैनात किया जाएगा। पुलिस में एक साथ भर्ती नहीं की जा सकती। जवानों को ट्रेनिंग के बाद ही मैदान में उतारा जाता है।

शहरी नक्सलियों को नहीं घेर पाई पुलिस

राज्य में नक्सली समर्थकों को घेरने के लिए 2005 में राज्य विशेष जनसुरक्षा अधिनियम बनाया गया था। पुलिस इस कानून के तहत चंद समर्थकों को ही आरोपी बना पाई है। इस कानून के तहत नक्सली समर्थकों को घेर पाने में पुलिस 2009 में पूरी तरह असफल रही है। राज्य पुलिस के सालाना रिपोर्ट के अनुसार राज्य विशेष जनसुरक्षा कानून के तहत सिर्फ सात प्रकरण दर्ज किए गए हैं। इसमें रायपुर, महासमुंद, धमतरी, कबीरधाम, बिलासपुर, रायगढ़, जांजगीर, कोरबा, सरगुजा, जशपुर, कोरिया, बलरामपुर, सुरजपुर, बस्तर, दंतेवाड़ा, बीजापुर, नारायणपुर में एक भी प्रकरण दर्ज नहीं कर पाई है। वहीं दुर्ग में राज्य विशेष जन सुरक्षा कानून के तहत एक प्रकरण दर्ज किया गया है। राजनांदगांव में पांच प्रकरण दर्ज हुए हैं। कांकेर में एक प्रकरण दर्ज हो पाया है। सूत्रों के मुताबिक पुलिस सही ढंग से शहरी और ग्रामीण नक्सली नेटवर्क को घेरने का प्रयास करती तो धमतरी, रायपुर, दुर्ग भिलाई, महासमुंद व कबीरधाम में लगभग आधा दर्जन से अधिक प्रकरण दर्ज कर सकती थी। सूत्रों के मुताबिक खुफिया विभाग ने लगभग एक दर्जन ऐसे व्यक्तियों के विषय में जानकारी एकत्र की थी। इन्हें इस कानून के तहत पुलिस घेर सकती थी। 2008 में राज्य विशेष जन सुरक्षा कानून के तहत शहरी नक्सली नेटवर्क से जुड़े आरोपियों को रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग भिलाई में गिरफ्तार किया गया था। दुर्ग में एक प्रकरण में पुलिस के चालान पेश नहीं कर पाने के कारण जहां गिरफ्तार आरोपी अजय टीजे को जमानत मिल गई, वहीं विवेचना फाइल भी बंद करनी पड़ी थी। धमतरी और राजनादगांव जिले में हुए नक्सली हमले के बाद नक्सलियों के साथ मिले स्थानीय ग्रामीणों को पुलिस इस कानून के तहत गिरफ्तार नहीं कर सकी। नक्सल प्रभावित बस्तर और सरगुजा रेंज में भी पुलिस इस कानून के तहत नक्सली समर्थकों को घेर पाने में नाकाम रही, वहीं 2007 और 2008 की गिरफ्तारी में पुलिस द्वारा की गई विवेचना पर न्यायलीन कार्रवाई में गवाही और साक्ष्यों के परीक्षण के दौरान उंगलियां उठनी शुरू हो गई है।

सलवा जुड़ुम कार्यकर्ताओं ने किया हमला

रायपुर। नर्मदा बचाओ आंदोलन की प्रमुख व प्रसिद्ध गांधीवादी नेता मेघा पाटकर ने कहा कि दंतेवाड़ा और पूरे बस्तर की स्थिति गंभीर है। सरकार और सलवा जूड़ूम कार्यकार्ताओं के इशारे पर गांधीवादी मानवाधिकार कार्यकर्ताओं पर हमला कर उन्हें वापस जाने के लिए बाध्य किया गया। मेघा पाटकर ने फोन पर हरिभूमि को बताया कि उनकी मांग है कि वनवासी चेतना आश्रम के संस्थापक हिमांशु कुमार और उसके कार्यकर्ताओं को यहां काम करने की छूट मिलनी चाहिए। उन्होंने कहा कि वनवासी चेतना आश्रम के कार्यकर्ता कोपा कुंजाम से मिलने वह जेल गई थीं। जहां जेल के अधिकारियों ने कहा कि वह उन लोगों से नहीं मिलना चाहता है, लेकिन मुलाकात करने के लिए अड़े रहने पर उन्होंने बाद में एक पत्र दिखाया जिसे कोपा कुंजाम ने लिखा गया बताया गया है। जिसमें उसने नहीं मिलने की इच्छा जताई है। उन्होंने कहा कि यह पत्र कोपा कुंजाम का नहीं था। वह पत्र कोपा कुंंजाम ने लिखा भी है तो वह पूरी तरह पुलिस के दबाव में है। मेघा पाटकर ने कहा कि उनके साथ और भी मानवाधिकार कार्यकर्ता है। इनके साथ वह बस्तर की हालत जानने आई हैं। उन्होंने कहा हम बस्तर के खनिज, वनसंपत्ति का दोहन करने वालों में से नहीं है, लेकिन ग्रामीणों को भड़काए जाने के कारण ऐसी स्थिति निर्मित हुई है। उन्होंने कहा कि केन्द्रीय गृह मंत्री पी चिंदम्बरम ने कहा था कि वह बस्तर में जनसुनवाई करेंगे। यह कार्यक्रम वनवासी चेतना आश्रम का नहीं था। केन्द्रीय गृह मंत्री पी चिदम्बरम द्वारा स्वंय से जारी किया गया बयान था। इसमें वह प्रभावित क्षेत्र में समस्या जानने के लिए जनसुनवाई कार्यक्रम में शामिल होना चाहती थी, लेकिन इस कार्यक्रम को राज्य सरकार ने होने नहीं दिया। उन्होंने कहा कि सलवा जूड़ूम शिविर में आदिवासी परिवार सुरक्षित नहीं है। हम यहां सभी प्रकार की हिंसा का विरोध कर रहे हैं। इससे सरकार को डरना नहीं चाहिए। फोर्स सीधे साधे ग्रामीणों को नक्सली बनाकर मार रही है या फिर गिरफ्तार कर रही है। इससे आदिवासी परिवार शिविरों में रहने के लिए मजबूर है।