Friday, February 26, 2010

खान बंधु फिल्मे बनाने से काम नहीं चलेगा

सैफ अली खान की फिल्म कुर्बान और शाहरूख खान की फिल्म माइ नेम इज खान दोनो ही फिल्मों में मुस्लिम समाज केप्रति विदेशो में पैदा हुए नफरत को बताया गया है। दोनो ही फिल्में तरीफ कबिल है। शाहरूख खान और सैफ अली खान की एक्टिंग दिल को छु लेने वाली है। लेकिन माइ नेम इज खान में शाहरूख खान उर्फ रिजवान खान ने पूरी फिल्म में बड़े ही मार्मिक रोल के साथ कहा है कि माइ नेम इज खान आई एम नाट टेरिरिस्ट मै नहीं हूं आतंकवादी हर खान आतंकवादी नहीं पर आतंकवादी खान है इस बात को हम तभी नकार सकते है जब गलतियो में फतवा जारी करने वाला इस्लाम आतंकवादियों के खिलाफ उनके जेहाद नामक आतंकी आंदोलन के खिलाफ फतवा जारी करने का समय आता है तो चुप बैठ जाता है। ओसम बिन लादेन को खलनायक मानने के बजाए उसे नायक समझा जा रहा है। मुस्लिम समाज खुलकर तलिबान के खिलाफ नारे लगाने से कतराता है। हालांकि मुस्लिमो की राष्ट्रभक्ति पर जरा भी संदेह नहीं किया जा सकता है। लेकिन भारतीय सिनेमा के मुस्लिम कलाकार शाहरूख खान और सैफ अली खान ने अपने दोनो ही फिल्म मेें अमेरिका में हुए आतंकी हमले के बाद आम मुस्लिमो के खिलाफ फैली नफरत को अपने अभिनय के माध्यम से दर्शाते है। मुसलमान होना कोई गुनाहा नहीं लेकिन इस्लाम की आड़ लेकर आतंकवाद फैलाने वालो की पैरवी करना गुनाहा है। भारतीय सांसद में हमला करने वाले आतंकवादी अबजल गुरु को फांसी देने के लिए भारतीयो द्वारा किए जा रहे मांग के समर्थन में मुस्लिम समाज सड़को पर क्यो नहीं उतरता। आज मुस्लिम समाज के प्रति अन्दर ही अन्दर जो नफरत भारतीयो और विश्व के अन्य देशो में फैल रहा है उसके पीछे सिर्फ आतंकवाद है। 1857 से लेकर 1947 तक भारतीय मुसलमानो ने आजादी की लड़ाई में बढ़चढ़कर हिस्सा लिया। आजादी की पहेली लड़ाई में बहादुर शाह जफर की कुर्बानी भुलाई नहीं जा सकती है। वहीं देश के लिए कुर्बान हुए अमर शहीद अशफाक उल्ला खान के त्याग को भुलाया नहीं जा सकता है। लेकिन अब समय आ गया मुस्लिम समाज दूसरे वर्ग के नफरत से बचने के लिए आतंकवाद का खुलकर विरोध करे। आतंकवादी चाहते है मुस्लिम नफरत से देखे जाए और फिर उनके साथ दूसरे कौम के खिलाफ जेहाद में शामिल हो जाए। उनकी पूरी कोशिश है कि मुस्लिम समाज पूरे विश्व में नफरत का शिकार होकर उनके खूनी संघर्ष में शामिल हो जाए। अब यह मुसलमानो के हाथ में है कि वह आतंकवादियों के चाल के शिकार हो या फिर आतंकवादियों के खिलाफ मोर्चा खोले। सिर्फ फिल्में बनाकर दिखाने से समाज में कोई परिवर्तन नहीं आने वाला है।

Monday, February 15, 2010

खाओ भारत का ,गाओ पाकिस्तान का


वादेमातरम। 13 फरवरी की शाम पुणे में हुए बम धमाको से केन्द्र सरकार और स्वंय को बुद्धिजीवी कहने और खेल भावना वाले शहरुख खान समर्थक जान ले कि पाकिस्तान जैसे आतंकवादी देश के साथ हमदर्दी दिखाने का क्या खम्यिाजा भुगतना पड़ता है। भारत तभी तक धर्मनिरपेक्ष है जब तक यहां हिन्दू बहुसंख्यक है। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने अपने गीता सार में लिखा था कि दुष्ट व्यक्ति के साथ दुष्टता से ही निपटा जा सकता है। सज्जनता वहां काम नहीं आती। लेकिन शाहरुख खान और उन जैसे खेल भावना वालो को कौन समझाए। देश को आतंकवादी ताकतो के हाथ में सौपने वाले बुद्धिजीवियों से अब डर लगने लगा है। मराठी हदय सम्राट शिव सेना सुप्रीमो बाला सहाब ठाकरे का बयान जैसा भी रहा हो लेकिन शाहरुख खान का बयान भी तरीफ के काबिल नहीं है। खाता भारत की है गाता पाकिस्तान की है। खैर शाहरुख की जिद देश से बड़ी नहीं है। पाकिस्तान के खिलाफ भारतीयो को भी नफरत दिखानी होगी। नहीं तो सज्जनता इस्लामिक आतंकवाद के सामने टिक नहीं पाएगी। बुद्धि जीवियों और खेल भावना वाले महापुरुषो की बात मानकर देश चले तो पाकिस्तान देश में आतंकवादी घटनाओ को श्रेय देता रहे और हम सिर्फ हिंदु मुस्लिम सिख ईसाई आपस में है भाई भाई कहकर लोकतंत्र की दुहाई देकर होटल ताज के हमले को एक बार फिर आमंत्रण दे दे। क्योकी इस देश को शाहरुख खान और उसके चाहने वाले दर्शक चलते है। इनके साहस की जितनी तरीफ की जाए कम है पुलिस की कड़ी सुरक्षा में माई नेम इज खान देखने जाते है। इन्हें टॉकीज में तोड़फोड़ होने का डर नहीं है। मुठ्ठीभर राष्ट्रवादी देश के बहुसंख्यक बुद्धिजीवियों का कुछ नहीं बिगाड़ सकते है। फिर सरकार भी उनके साथ है क्यो न हो लोकतंत्रिक जनता है। पुलिस जवानो की विधवाओ के आंसू पोछने भले ही नहीं जा पाएगी। कारगिल की लड़ाई भूल जाएगी। लेकिन कड़ी सुरक्षा में माइ नेम इज खान देखेगी। पहले भी भारत देश नाच गाना सुनने वाले और मनोरंजन की दुुनिया में खोने वाले राजा महाराजा नवाबो के कारण गुलाम हो चुकी है। अब फर्क बस इतना है कि अब राजा महाराजा नवाब नहीं रहे यहां की जनता ही आजादी पाकर इनका इतिहास रचने जा रही है। कला भावना और खेल भावना से देश को गुलाम करने जा रही है।

Wednesday, February 10, 2010

भूमकाल दिवस,नक्सलियों के खिलाफ खुला मोर्चा

रायपुर बीस साल बाद बस्तर में भूमकाल दिवस पर आदिवासी ग्रामीणों ने नक्सलियों के शोषण और दमन के खिलाफ लड़ाई लड़ने की घोषणा करते हुए हिंसक माओवादी विचारधारा के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया है। पिछले महीने स्कूली छात्रो की गला रेतकर की गई हत्या के बाद से ग्रामीणों में नक्सलियों के प्रति घृणा जाग गई है। इसका असर भूमकाल दिवस पर देखने को मिला। ब्रिटिश काल में आदिवासियों ने अंग्रेजी हूकूमत के खिलाफ बिगुल फूकते हुए लड़ाई छेड़ी थी। इस लड़ाई को भूमकाल नाम दिया गया। आजादी के बाद से लगातार 10 फरवरी को बस्तर में भूमकाल दिवस मनाया जाता है। जगदलपुर में मनाए जा रहे भूमकाल दिवस के मौके पर पहली बार आदिवासी समाज ने नक्सलियों के खिलाफ लोकतंत्रिक तरीके से लड़ाई जारी रखने की घोषणा करते हुए शोषण के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाले शहीद गुंडाधूर,डेवरी धु्रव सहित आजादी की लड़ाई में शहीद हुए अन्य शहीदो को याद किया। इस मौके पर पुलिस विभाग द्वारा लगाए गए नक्सल विरोधी जनजागरण शिविर में आदिवासी जनता ने हिस्सा लिया और भारी संख्या में नक्सल विरोधी पर्चे और पोस्टर का कार्यक्रम स्थल में वितरण किया गया। इस मौके पर एसपी पी सुंदरराज भी ग्रामीणो ने आदिवासी समाज के जवान बच्चे और छात्र छात्राओं को नक्सली द्वारा अपने लड़ाई में शामिल किए जाने का विरोध करते हुए नक्सली शोषण के खिलाफ मोर्चा खोलने का आव्हान किया है। सूत्रों के मुताबिक अब तक भूमकाल दिवस के मौके पर नक्सली समर्थक नेता ग्रामीणों को दिग्भ्रमित करते हुए सरकार को शोषक बताती आई थी। खासतौर से नारायणपुर में पिछले महीने दो स्कूली बच्चो की गला रेतकर हत्या किए जाने के मामले में नक्सलियों की जमकर निंदा की गई है।

अब सीबीआई करेगी बाबूलाल से पूछताछ

। रायपुर आयकर छापे के बाद कृषि सचिव बाबूलाल अग्रवाल और उनके पीए सुनील अग्रवाल द्वारा बयान बदला गया। आयकर अफसरो को जांच में मदद नहीं किए जाने और राष्ट्रीयकृत बैंक अफसरो के साथ मिली भगत कर किए गए करोड़ो रुपए के निवेश के मामले में आयकर विभाग ने यह प्रकरण बुधवार की शाम सीबीआई को सौप दिया। अब इस मामले में जांच का नेतृत्व सीबीआई करेगी। आयकर विभाग भोपाल के महानिदेशक (अन्वेषण) बृजेश गुप्ता ने बताया कि बुधवार को दिनभर बैक आंफ बड़ौदा में आयकर अफसरो द्वारा जांच पड़ताल की गई है। यहां के लाकर्स से 15 लाख रुपए नगद बरामद हुए है। यह लाकर्स पहले कृषि सचिव बाबूलाल अग्रवाल के नाम पर था। वर्तमान में इसे उनके भाई पवन अग्रवाल के नाम पर कर दिया गया है। आईएएस अफसर द्वारा किए गए कर चोरी के मामले में राष्ट्रीय कृत बैंक के अफसरो की भी मिली भगत का मामला सामने आ रहा है। इसे देखते हुए मामला सीबीआई को सौप दिया गया है। अब इस मामले में राज्य आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो,आयकर इन्वेस्टीगेशन सेल सहित सीबीआई जैसे देश की सर्वोच्च जांच एजेसीं भी जांच पड़ताल और आईएएस अफसर बाबूलाला अग्रवाल से पूछताछ करेगी। इस मामले में सीए सुनील अग्रवाल द्वारा भी आयकर अफसरो के खिलाफ दबाव डालने का शपथ पत्र अफसर को दिया गया था। इस पूरे मामले में आयकर अफसरो पर पलटवार करने की मंशा को देखते हुए आगे की जांच पड़ताल का नेतृत्व सीबीआई को सौप दिया गया है। बाक्सग्रामीण करेगे जांच एजेंसियों को मदद राजधानी से लगे खरोरा इलाके के मूल निवासी सीए सुनील अग्रवाल द्वारा गांव के लोगो का फर्जी तौर पर बैंक खाता खोला गया था। इस मामले में 28 ग्रामीण सीए सुनील अग्रवाल सहित उसके अस्टिेंट अलोक अग्रवाल और यूनियन बैंक के अधिकारी कर्मचारी के खिलाफ धोखाधड़ी कर उन्हें निवेश कंपनी में फर्जी तौर पर ज्वाइंट डायरेक्टर बनाए जाने और उनके नाम से फर्जी खाते खोले जाने के मामले में अपराध कायम करवाने वाली है। बताया जाता है कि इनके खाते से लाखो रुपए का लेनदेन हुआ है। इन्हें खाते और रकम के बारे में आयकर अफसरो से जानकारी मिल पाई है। आयकर विभाग के सूत्रो के मुताबिक छापे की कार्रवाई के दौरान ही बैंक अफसरो ने साक्ष्य मिटाने का कार्य किया है। बैंक में लगे विडियो फूटेज में 1 से 9 फरवरी का रिकार्ड गायब है।

Saturday, February 6, 2010

बाबूलाल ने ग्रामीणों को banaya karorpati

रायपुर आईएएस अफसर बाबूलाल से भी ज्यादा चालक उनका सीए निकला जिसने अपने गांव के ग्रामीणों को इंकमटैक्स फाइल बनाने के नाम पर औपचारिकता पूरी करवाई और उनके नाम से बैंक में फर्जी खाते खोलकर अफसर के ब्लैक मनी को व्हाइट मनी में तब्दील कर दिया। आयकर अफसरो द्वारा फर्जी पासबुक की में दर्ज नाम के आधार पर खरोरा में शिविर लगाकर करोड़पति ग्रामीणों का साक्षत्कार लेना पड़ा तब जाकर खेत में काम कर रहे ग्रामीणों को पता चला कि वह करोड़पति हैं। उनके नाम से एक बड़ा उद्योग समूह चल रहा है। जिसमें वह ज्वाइंट डायरेक्टर हैं। कृषि सचिव बाबूलाल अग्रवाल के सात ठिकानो में छापेमार कार्रवाई करने वाले आयकर अफसरो को जब सीए सुनील अग्रवाल के निवास और दफ्तर से ढेरो ऐसे दस्तावेज और बैंक पासबुक मिले जिसमें से 40 करोड़ रुपए इधर से उधर हुए थे। इसके आधार पर आयकर अधिकारियों का एक तीस सदस्यी दल दो शुक्रवार से खरोरा में डेरा डाले हुए था। लगभग 28 बैंक खातो के आधार पर खरोरा में पुलिस और कोटवार के मदद से पुकार लगाई गई,तो इसमें से अधिकांश करोड़पति की हैसियत रखने वाले अग्रवाल एंड कंपनी के साझेदार ज्वाइंट डायरेक्टर खेतो में काम करते नजर आए। आयकर अफसरो की पूछताछ में इन्हें जब पता चला कि इनके नाम से राजधानी के रामसागरपारा इलाके में स्थित यूनियन बैंक में खाते हैं। इसमें से लाखो रुपए इधर से उधर हुए है। तो गश खाकर गिर पड़े आयकर अफसरो ने जब उद्योगो में साझेदारी होने के दस्तावेज दिखाए तो बहुत का पसीना छूट गया। फर्जी बैंक खाते और अग्रवाल के कंपनी में साझेदारी करने वाले ग्रामीण जीवन लाल चंद्रकार,प्रीतम सिंग ठाकुर, समीर विश्कर्मा,भोला यादव, भूषण नायक ,धनजंय शर्मा ,दिपक धनगर सहित ने हरिभूमि को चर्चा करते हुए बताया कि लगभग पांच से छह साल पहले खरोरा निवासी सीए सुनील अग्रवाल और उसके रिश्तेदार अलोक अग्रवाल ने गांव के लोगो को इंकम टैक्स फाईल के महत्व को बताते हुए इंकम टैक्स फाइल मुफ्त में बनवाने का झांसा दिया था। इसके आधार पर गांव के सैकड़ो लोग औपचारिकाता पूरी कर इंकाम टैक्स फाइल बनाने के लिए तैयार हो गए थे। बाद में सब को इंकम टैक्स फाइल भी दी गई। इससे गांव के और भी लोग अलोक अग्रवाल के संपर्क में आए और इंकम टैक्स फाइल बनवाने की औपचारिकाता पूरी करने लगे। लेकिन अब अचानक आयकर अफसरो की खरोरा पहुंचने के बाद ऐसे 28 नाम सामने आए है। जिनके नाम से सीए सुनील अग्रवाल और उसके रिश्तेदार और अस्टिेट अलोक अग्रवाल ने रामसागरपारा स्थित यूनियन बैंक में फर्जी खाते खोलकर ब्लैक मनी को व्हाईट मनी में तब्दीलकर निवेश किया है। करवाई थी।

Thursday, February 4, 2010

छत्तीसगढ़ में बाबूलाल जैसे अफसर रहेगे तो नक्सलवाद तो पैदा होते रहेगा

छात्र राजनीति में पत्रकारिता में और कड़वा बोलने वाले रिश्ते से मेरे बड़े भाई लगने वाले अनिल पुसदकर की प्रेरणा से पहली बार अपने विचार ब्लाग में लिख रहा हूं ऐसे पिछले एक साल से में सिर्फ मै नक्सलवाद के खिलाफ समाचार ही लिख रहा हुं। पिछले दिनो अनिल भैय्या ने ब्लाग लिखने वालो से अपील की थी कि वह अपने विचार के साथ साथ अपने आसपास की घटनाओ का समाचार भी लिखे लेकिन यह मेरे ऊपर लागू नहीं होता था क्योकी मै तो पहले से ही समाचार लिखता था। लेकिन अब भैय्या के कहने को उल्टा करते हुए विचार लिख देता हूं
मेरा विचार व्यक्तिगत भी नहीं है। आईएएस अफसर बाबूलाल अग्रवाल के परिवार में पड़े आयकर के छापे के बाद यह पूरी तरह स्पष्ट हो चुका है कि अमीर धरती गरीब लोग यह सिर्फ शीर्षक ही नहीं वास्तव में यह छत्तीसगढ़ का चेहेरा है। आयकर विभाग ने भले ही रातो रात यह स्पष्ट कर दिया है कि छापा किसी अफसर के बंगले में नहीं बल्कि अफसर के परिवार के व्यापरिक प्रतिष्ठानो में हो रहे आयकर की चोरी के कारण पड़ा है। लेकिन छापा गरीब धरती के उन अमीरो के यहां पड़ा है। जिनके परिवार का एक सदस्य छत्तीसगढ़ के प्रशासनिक अमले में एक महत्वपूर्ण पद पर काबिज है। पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने पिछले महीने विधानसभा में कहा था कि छत्तीसगढ़ से नक्सलवाद खत्म तो हो जाएगा लेकिन अगर समस्याओ की जड़ में नहीं पहुंचा गया तो कोई और वाद पैदा हो जाएगा। यह सही बात है कि आज भी छत्तीसगढ़िया दो वक्त के रोटी के लिए खून पसीना एक करने के बाद भी पूरे परिवार के लिए रोटी कपड़ा मकान की व्यवस्था नहीं कर पा रहा है। जानवर से भी बदतर जीवन जीने वालो के हक को मारकर अपनी तिजोरी भरने वाले अफसर और व्यापारी यहां के भोले भाले और शांति से जीने वाले लोगो को सशस्त्र क्रांति के लिए मजबूर कर रहे है। भगवान किष्ण ने गीता में कहा है कि चोरी तब होती है जब एक आदमी के पास जरुरत से कम हो और एक आदमी के पास जरुरत से ज्यादा हो और शायद इस बैलेंस को बरकार नहीं रखा गया तो नक्सलवाद और न जाने कौन कौन से वाद पैदा होने लगगे। हालांकि आईएएस अफसर ने भी प्रदेश के नंबर वन अखबारो में अपना पक्ष रखते हुए आयकर छापे को अपने खिलाफ षडयंत्र करार दिया है। बहारहाल परिवार तो उनका ही है। और यह बात कौन पचाया गया। स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि जैसे विभाग के महत्वपूर्ण पदो में रहने वाले अफसर से क्या उम्मीद की जाए।

Wednesday, February 3, 2010

हथियार लाओ पैसे ले जाओ

रायपुर। नक्सल प्रभावित बस्तर में चल रहे आपरेशन ग्रीन हंट से नक्सलियों में बौखलाहट पैदा गया है। पुलिस ने इसका फायदा उठाते हुए सरेंडर पैंकेज का फार्मूला नक्सलियों के सामने रख दिया है। इससे बहुत जल्द ही बड़ी संख्या में नक्सलियों के आत्मसर्मपण करने की संभावना है। हथियार के साथ आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों को बीस हजार रुपए से लेकर तीन लाख तक की राशि दी जाएगी। नक्सलियों को मुख्यधारा में लौटाने के लिए केन्द्र और राज्य सरकार ने लुभावाने पैकेज बनाए थे। 2005 में 1378 नक्सलियों ने आत्मसर्मपण किया था। पिछले साल 2008-09 में 13 नक्सलियों ने आत्मसर्मपण किया है, लेकिन नक्सली फौज में शामिल ग्रामीण भयवश इस पैकेज को नकारते रहे हैं। आत्मसर्मपण करने वालों को नक्सली अपनी हिट लिस्ट में रखते हैं। इसके कई उदाहरण हैं। पिछले नौ सालों में नक्सलियों द्वारा मारे जाने वाले ग्रामीणों में लगभग सौ ऐसे सदस्य भी शामिल हैं। उन्होंने नक्सलियों का साथ छोड़ा था। सूत्रों के मुताबिक बस्तर के नक्सली कमांडर केन्द्री अर्धसैनिक बलों के पहुंचते ही वहां से निकल चुके हैं। स्थानीय नक्सली लड़ाके मोर्चा संभाले हुए हैं। नक्सली कमांडरों को यह उम्मीद है कि किसी तरह उनके समर्थक केन्द्र और राज्य पुलिस द्वारा चलाए जाने वाले ज्वाइंट आपरेशन को रोक पाने में सफल होंगे, लेकिन केन्द्र की मदद से तीन राज्यों में ज्वाइंट आपरेशन शुरू हो गया है, लिहाजा नामी नक्सली कमांडर भूमिगत हो चुके हैं। अधिकारिक सूत्रों के मुताबिक केन्द्रीय खुफिया विभाग के पास अब भी बहुत से नक्सली कमांडरों की तस्वीर नहीं है। जबकि आतंकी मामले में खुफिया विभाग के पास ईनामी आतंकियों के तस्वीर और स्केच मौजूद हैं। यही कारण है कि ईनामी नक्सलियों के पुलिसिया इश्तहार नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में चिपकाए तो जाते हैं, लेकिन ईनाम की रकम के साथ उनकी तस्वीर नहीं लगी होती है।