Wednesday, July 27, 2011

रेलवे प्लेटफार्म में लावरिस बच्चो को अपराध के दलदल से बचाने सिधुं ताई का अभियान

पुणे,मुंबई में अपराध कम करने के लिए महाराष्ट्र पुलिस ने काफी प्रयास किया और विभिन्न समाजिक संस्थाओं के साथ मिलकर अभियान भी चलाए लेकिन एक अभिय़ान महाराष्ट्र पुलिस के बिना मदद पूणे के प्लेटफार्म में एक एसा ही अभियान सिंधु ताई ने चलाया है। सिधुं ताई यह वह महिला है जो वर्षो पहले पुणे के प्लेटफार्म में भीख मांगा करती थी। उसने अपने आंखो से देखा था लावरिस बच्चो को होश संभालते ही यात्रियों के जूठन खाते और फेके हुए कचरे से खाने पीने की चीज ढूंढते हलांकि वह भी उनके बीच एक हिस्से के रूप में मौजूद थी। देश का कहो या फिर विदेश में ही क्यो ना हो रेल्वे प्लेटफार्म आवारा और लावरिस बच्चो की जन्म स्थली या कर्म स्थली के रूपमें पहचानी जाती है। लेकिन अब इन प्लेटफार्म से आवार और लावरिस बच्चो को असामजिक होने से बचाने के लिए और अपराध के दलदल में जाने से रोकने के लिए एक अभियान सिधुं ताई चल रही है। प्लेटफार्म के अधिकांश बच्चे अब सिंधु ताई के चार आश्रमों में अपराधिक जिंदंगी से छुटकारा पाकर समाजिक जिंदगी जी रहे हैं।

अब तक २७२ पुरस्कार से सम्मानित और भिक्षा व दान से मिले हुए पैसों से अनाथो के लिए पुणे सहित अमरावती महाराष्ट्र में चार आश्रमों का संचालन करने वाली ये वृद्ध महिला को देश और समाज सिंधु ताई के नाम से जानता है। पहले वो पुणे के रेलवे स्टेशन में भिक्षा मांगा करती थी, अब वो अपने आश्रम के बच्चों और वृद्धों के लिए भिक्षा मागंती है. सिंधुताई अनाथो की माई हजारो से भी ऊपर जिसके तरुण और वृद्ध बच्चे है.,सिधुं ताई पर आनंद नारायण महादेवन के निदेशन बनी मराठी फिल्म मी सिंधुताई सपकाल"मी सिंधुताई से आईएमएनबी संवाददाता नीलम बी से हुए बातचीत के अंश उनकी जुबानी उन्हीं
कहानी प्रस्तुत हैं।

अनाथो की माई' आप को क्यो कहते है. ये नाम आप को कैसे मिला ?
माई : में खुद अनाथ थी, अब मेरा परिवार बहुत बड़ा है. अनाथ होने का दर्द और जीवन का संघर्ष बखूभी समझती हु, क्यों के ये सब मैंने अनुभव किया है." में अनाथ तू अनाथ, तेरा मेरा जम गया". मेरी जात अनाथ है,इस तरह दुसरे अनाथो के पास पहुंच गई और उनकी माई बन गई.

आपके जीवन का अब तक का ये सफ़र संक्षेप में बताये
माई : मेरे जीवन पर किताबे लिखी गई है, जो कर्नाटक के पाठशाला में पढ़ाए जाते है और (सिनेमा)फिल्म भी बन चूकी है. मेरी पूरी कहानी इस सिनेमा में दर्शाइ गई है. इस लिए में तमाम आईएमएनबी समाचार पड़ने वालो को दरखास करती हुं के आप ये सिनेमा 24 जुलाई, रविवार को झी मराठी पर जरुर देखिए.

ये जो अपने जीवन में संघर्ष का सामना आपने किया है अब तक ,इस अनुभव से आप आज की महिलाओं को क्या संदेश देना चाहेंगी
माई : " सीना तान के आगे बढो. ये भी कुछ कम नहीं तेरा दर छुटने के बाद, हम अपने पास आये दिल टूटने के बाद". अरे दिल टूटने के बाद पता चलता है, इसी का नाम जिदंगी है. " हाँ जब वो आये तो चेहरे पर रख रखाव था, मगर वो जो नहीं देख सके वह मेरे दिल का घाव था".अपना घाव अगर कोई नहीं समझ सकता तो उसका प्रदर्शन नहीं करना चाहिए. दूसरो का घाव और दर्द को समझने के लिए ही स्त्री का जन्म हुआ है. अगर वो अपने घाव को पचा कर दर्द को समझ सकती है,तो ही वो दूसरो के दर्द हल्का करके ख़ुशी दे सकती है.माई आपको दुसरो की पीड़ा देख कर बहुत दर्द होता है ?,आप किस तरह इस में ख़ुशी ढूंढ लेती है!माई : मेरा दर्द मैंने जी लिया. दुसरो का दर्द समझती हूँ, और बाटंती भी हूँ. जब पुणे रेलवे प्लेटफार्म पर आखरी ट्रेन निकलती, तो सारे लोग अपने अपने घर जाने के लिए बोगी पकड़ते और में लाचार की तरह उन्हें देखा करती. मुझे घर नहीं चाहिए था बस एक रात बिताने के लिए घर के कोने का असरा चाहिए था. क्यों के मुझे अकेले रहने का कोई दर्द नहीं था पर लोंगो से डर लगता था. मुझे किसी ने नहीं पुछा के तुम्हे कहा जाना है. तुम्हे घर नहीं तो चलो हमारे घर के कोने में रहलो. इस लिए में अभी भी रेलवे प्लेटफार्म पर जाती हु, किसी को मेरी जरुरत है क्या देखती हु. मुझे किसी ने नहीं कहा तो क्या, में अनाथो को अपने साथ ले आती हूँ और मेरे उस दर्द में इस तरह से ख़ुशी में ढूंढ लेती हुं." सच कहू तो मुझे अब खुशी से एलेर्जी हो गई है. दर्द मुझे प्यारा लगने लगा है".

माई से और भी बाते होती रहेगी. उनके और भी अनुभव हम जानेंगे दुसरे रु ब रु मुलाकत में और कुछ सिखने की कोशिश करेंगे. "मी सिंधुताई सपकाल" सिनेमा जरुर देखिए ये हर स्त्री के जीवन से जुडी ये कहानी है.

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