Tuesday, December 15, 2009

नौ साल में एक हजार सिर कलम




रायपुर। राज्य निर्माण के बाद से अब तक नक्सलियों और पुलिस के बीच चल रहे संघर्ष में नक्सलियों ने एक हजार ग्रामीणों को मौत के घाट उतार दिया है। इनमें अधिकांश का सिर कलम कर दिया गया। इन पर नक्सलियों ने पुलिस के लिए मुखबिरी करने का आरोप लगाया था। दूसरी ओर पुलिस ने नक्सलियों द्वारा मारे गए ग्रामीणों को अपना मुखबीर मानने से हर बार इंकार किया है। राज्य निर्माण के बाद से अब तक नक्सली एक हजार एक सौ बत्तीस ग्रामीणों को कूरतापूर्वक गला रेतकर मौत के घाट उतार चुके हैं। सूत्र बताते हैं कि नक्सली बात नहीं मानने पर मारपीट करते हैं। पुलिस की मुखबीरी करने और किसी भी नक्सली घटना में पुलिस द्वारा गवाह बनाए जाने पर भी वे ग्रामीणों की भीड़ एकत्र कर खुलेआम अमानवीय सजा देते हैं। बस्तर संभाग सहित राजनांदगांव में भी ऐसी अमानवीय मुहिम जारी है। यही कारण है कि अब नक्सलियों के खिलाफ ग्रामीणों में दहशत व नफरत बढ़ती जा रही है, लेकिन जहां नक्सली उनके साथ अमानवीय सलूक करते हैं, वहीं सरकार और पुलिस का रवैया भी किसी तरह कम नहीं आंका जा सकता। लगातार संख्या बढ़ी राज्य बनने के बाद नक्सली हिंसा में मरने वाले ग्रामीणों की संख्या लगातार बढ़ती रही। राज्य में सत्ता परिवर्तन के साथ ही नक्सलियों के खिलाफ अभियान तेज होने पर मौत के आंकड़े भी बढ़े। इसी तरह नौ साल में मारे गए नक्सलियों की संख्या की पुलिस ने 405 दर्ज की है। इस मामले में पुलिस का कहना है कि मुठभेड़ में नक्सली इससे ज्यादा मारे गए हैं। लेकिन पुलिस ने नक्सलियों के शव बरामदगी के आधार चार सौ पांच की संख्या दर्ज की है। वहीं इस दौरान पुलिस और केन्द्रीय अर्धसैनिक बल के 461 जवान मारे गए हैं।

मृतकों को शहीद का दर्जा मिले
नक्सलविरोधी आंदोलन चलाने वाले छत्तीसगढ़ लोकतांत्रिक एक्शन कमेटी के प्रभारी डॉ.उदयभान सिंह चौहान ने कहा कि बस्तर में युद्ध की स्थिति है। पुलिस और नक्सलियों के संघर्ष में मारे जाने वाले ग्रामीणों को सरकार शहीद घोषित करते हुए उनके परिवार को राहत राशि देने के साथ ही एक सदस्य को पुलिस में नौकरी दे। लंबे समय से पुलिस अपने लिए काम करने वाले ग्रामीणों को मौत के घाट उतारे जाने पर पल्ला झाड़ लेती है। कानून का साथ देने वाले साहसी लोगों का सम्मान करने से सरकार को भी बचना नहीं चाहिए।

ग्रामीणों की मौत के आंकड़े
वर्ष मृत ग्रामीण
2000 --- 20
2001 --- 23
2002----- 29
2003 ---- 36
2004 ----61
2005 ----126
2006 ---306
2007---166
2008---- 143
2009 --- 102(30 नवंबर तक)
नक्सली अपनी बात नहीं मानने वाले ग्रामीणों को अमानवीय तरीके से मौत के घाट उतारते हैं। गांवों में अपना दहशत कायम करने के साथ मृतक पर भी दोष गढ़ने की नीयत से उसे पुलिस का मुखबीर घोषित करते हैं। यह बात अब बस्तर के ग्रामीण अच्छी तरह समझने लगे हैं। नक्सलियों का दबाव रहता है कि ग्रामीण उनके संघम सदस्य बनें और जनमिलिशिया जैसे दल में शामिल हो जाएं।
- विश्वरंजन
डीजीपी

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